Tuesday, May 12, 2009

Mujhse Pehli si muhabbat mere mahbuub na maang



FAIZ AHMED FAIZ
Ask me not, my beloved, for our first love
I believed that if I had you, the world would shine eternally
If you were sorrowful, what mattered then the sorrows of the world?
From your beauty poured into the world an eternal spring
Beyond your eyes what is there to be seen in this world?

To have you would be to hold fate in my grasp
It was not as such; I fervently desired it to be so

The world knows pains besides those of love
There are joys besides the joys of our love

The dread spell of countless centuries
Draped in silk, satin, and gold brocade
In those streets and bazaars, everywhere bodies are sold
Besmeared with dirt, bathed in blood.

My gaze turns to there: what can I do?
Even now your beauty shines bright: but what can I do?

The world knows pains besides those of love
There are joys besides the joys of our love
Ask me not, my beloved, for our first love

Thursday, April 16, 2009

आईना झूठ बोलता ही नहीं!!

आज देश के कई क्षेत्रों में चुनाव है. इन में से कई सीटों पर समाजवादी
पार्टी चुनाव लड़ रही है, जिसके घोषणापत्र ने सनसनी सी फैला दी थी. टीवी
के चिंतकों से लेकर व्यक्तिगत बैठकों तक लोगों ने छीछालेदर किया जैसे
घोषणापत्र नहीं शपथपत्र हो कोई. गांधीजी के देश में सत्य का मखौल उड़ा. इस
लेखक को अगर इस बरस के घोषणापत्रों में कोई जँचा तो वह सिर्फ समाजवादी
पार्टी का ही. हमारे राजनितिक विश्लेषकों और प्रगतिशील चिंतकों को भले
पसंद ना आया हो. जिन कारणों से उन्हें सपा का मेनीफेस्टो नहीं भाया, ठीक
उन्हीं कारणों से मुझे भी फूटी आँख ना सुहाया. पर सच बोलने का नंबर तो
मिलना चाहिए, इसीलिए मेरी तरफ से मुलायम सिंह और अमर सिंह को बहुत बधाई.
गांधीवादी विचारों के लिए नहीं, बल्कि गाँधी जैसी सत्यवादिता के लिए. आज
जो वोटर अपने लोकतंत्र के मशीन का बटन दबा रहा होगा उत्तर प्रदेश में उसे
कम से कम यह तो मालुम है कि कौन सी पार्टी उसे फुसला नहीं रही. इक्कीसवीं
सदी के हसीं सपने दिखाने कर सोलहवीं सदी की तरफ हमें बहुत लोग ले गए, सपा
पहली पार्टी है जो सोलहवीं सदी का सपना दिखाकर हमें सोलहवीं सदी में ले
जा रही है. गर्त में जाना तो हर हाल में है पर अगर मालूम हो तो आदमी
तैयार तो रहे.
अब कांग्रेस के मुखपत्र को ले लें. सारे सुनहरे सपने हैं पेट और रोजगार
के. पर यह अगर वह कर सकते थे तो पिछले पांच सालों में लाखों पेट पीठ एक
नहीं होते. लेफ्ट की लकुटिया खिसकी तो सपा के अमर ने टेक देकर कार्यकाल
पूरा करवा ही दिया. कार्य पूरा नहीं कर पाए सो पांच साल और मांग रहे हैं.
जब जंग में कूदे तो सपा भी साथ नहीं और उनके प्यारे लालू और पासवान भी
बिदक लिए. जब साथियों को भरोसा नहीं रहा तो दुश्मनों का क्या भरोसा. और
मुद्दे वही हैं इस चुनाव के भी. खाद्यान्न सुरक्षा और रोजगार की रक्षा.
बिजली, पानी और सड़क तो अब भी वादे हैं. साठ साल पुराने लोकतंत्र में अगर
अब भी इसका वादा किया जा रहा है तो शर्म की बात है. पर उन को आती नहीं
जिन पर आस टिकी है.
भाजपा के मुखपत्र में राम, बगल में छुरी. इस बार तो कमाल ये हुआ कि दूसरे
गाँधी वरुण मुंह में छुरी रखे हमारे संविधान को मुंह चिढाने लगे. माता
मनेका अपने पुत्र प्रेम में भूल गयी कि हाथ पैर काटने का न्याय अगर होता
तो चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी. अभी हम स्वात तो भये नहीं, पीलीभीत को
पीलीभीत ही रहने दो. पर इस बार चुनाव में हर मर्यादा लांघना जैसे
प्रतियोगिता का हिस्सा है. मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर हो अगर तो फिर
क्या कहना. इरादे नेक नहीं भी हों, पर साफ़ तो होने चाहिए. पांच साल के
लिए अकेले भाजपा की सरकार बनने से रही पर मंदिर का टोकन चस्पां कर ही
दिया अपने घोषणापत्र में. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, धारा 370 और मंदिर वहीं
बनायेंगे का नारा पुराना हो गया है पर झूठ आसान होता है सो उन्होंने
सुचना तकनीक की क्रांति लाने का वादा कर दिया. अब हर गोद में होगा
लैपटॉप. दो रुपये में मिलेगा चावल और सब को रंगीन टीवी फ्री. किसानों की
बिजली माफ़ आदि आदि. मसला यह है कि इन में से कोई भी मुद्दा नहीं है और
अगर करेंगे भी तो कहाँ से करेंगे, इसकी चर्चा नहीं. वादे हैं वादों का
क्या. आपको कर्णाटक जैसे राज्य में पहली बार पूरा बहुमत दे दिया और आपने
बहू-बेटियों पर एक श्री राम सेना छोड़ दी. सोलहवीं शताब्दी तक ले जाने का
काम और इक्कीसवीं शताब्दी के नेत्रित्व की कल्पना.
हमारे वामपंथी इस बात के लिए जाने जाते थे कि अपने पंथ के लिए वह देश के
खिलाफ भी जा सकते हैं. पर इस बात का सुकून तो था ही कि ये कम से कम
सिद्धांतों पर तो अटल थे. अब कागजी हो गए हैं इनके भी सिद्धांत. जात और
धर्म आधारित राजनीति से कभी बिलकुल परे रहने वाले कोमुनिस्ट आज चुपके
चुपके अपना धर्म छोड़ यहाँ वहाँ मुंह मारते दिखेंगे. कभी सिर्फ
साम्प्रदायिक बीजेपी को सत्ता से अलग रखने के लिए दुश्मनों तक से हाथ
मिलाने वाले केरल में साम्प्रदायिक मदनी के कुरते में कब घुस गए पता ही
नहीं चला. धुर जातिवादी मायावती से करार किया और अपने वर्ग-संघर्ष की
लडाई से किनारा.
इन सब के घोषणापत्र देखिये या झूठ का पुलिंदा, फर्क नहीं. आखिर
समाजवादी पार्टी ने कम से कम यह तो स्वीकार किया कि उनके नेता भले अपने
बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजें पर आम आदमी के बच्चों के लिए
अंग्रेजी सीखना ज़रूरी नहीं होगा. आखिर आम और खास में फर्क तो रहे. हमारे
नेताजी के पुत्र भले लैपटॉप पर इस घोषणापत्र को अंतिम रूप दे रहे हों पर
आम आदमी के लिए कंप्यूटर, ना बाबा ना. और ट्रक्टर जैसे मशीन तो बड़े
ज़मींदार किसानों कि बपौती है, उसे आम किसानों से दूर ही रखेंगे. मजदूर
हो मजदूर की तरह रहो, हाथ से मैला उठाने वाले मशीन के सपने ना देखें. हम
ने इस देश में आम आदमी को स्कूटर के लिए लाइन लगाते देखा है, क्यूँ नहीं
जा सकते वापस उसी वक़्त में. गैंडे की भी खाल मोटी होती है पर बेचारे को
पॉलिटिक्स में इंटेरेस्ट नहीं. बाकी जिस जानवर की खाल मोटी हो और जुबान
खोटी, मैदान खुला है आ जाओ. लोकतंत्र के आईने में निहारिये अपनी सूरत,
सीरत जाए तेल लेने. बस सपा ने अपनी सीरत दिखाई, भद्दी सही पर हिम्मत की
दाद दरकार है. बाकी हैं तो सभी एक जैसे, क्यूंकि झूठ की इन्तेहा नहीं
होती. बकौल कृष्ण बिहारी नूर,

सच घटे या बढे तो सच ना रहे, झूठ की कोई इन्तेहा ही नहीं;
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं!!

Monday, March 16, 2009

ज़ख्म के भरने तलक, नाखून न बढ़ जावेंगे क्या?

पाकिस्तान एक बार फिर वापस लौटा है झुलसा हुआ. राष्ट्रपति ज़रदारी ने अपने हठ को तब त्यागा जब उनको अपना अस्तित्व इस आग में जलता दिखा. आखिरी पलों में उन्होंने अपने कदम पीछे किये वर्ना वकीलों का लॉन्ग मार्च लाहौर में एक लोकप्रिय आन्दोलन का रुख कर चुका था. पर क्या पाकिस्तान का संकट टल गया है? एक जगह हो दर्द तो डायग्नोसिस भी हो जाती है और इलाज भी पर पाकिस्तान के शरीर पर इतने घाव निकल आये हैं कि एक की पट्टी होती है और दूसरा फूट पड़ता है. कई विश्लेषक यह मान कर चल रहे थे इस राजनितिक बवाल में सेना सत्ता अपने हाथ में ले लेगी. जहाँ सेना के संयम की प्रशंसा ज़रूरी है वहीँ इस बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि परवेज़ कियानी परवेज़ मुशर्रफ़ से अलग हैं. कियानी जानते हैं प्रॉक्सी से सरकार चलाना बागडोर अपने हाथ में लेने से बेहतर है. वह पिछली सीट पर बैठ कर ड्राइविंग करना पसंद कर रहे हैं. अगर ड्राइविंग सीट पर बैठे हों और गाड़ी सही दिशा में न चले तो ड्राईवर के छवि को बट्टा लगता है. जैसा परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ हुआ. पांच साल पाकिस्तान के हीरो रहने के बाद मुशर्रफ़ वहां के सबसे बड़े विलेन हो गए थे. वही काम ज़रदारी ने एक साल से कम समय में कर दिखाया है. ज़रदारी के खिलाफ न सिर्फ पंजाब में बल्कि उनकी पार्टी का गढ़ माने जाने वाले सिंध में भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं. ऐसा क्या कर दिया उन्होंने कि चन्द महीनों में अपने अज़ीज़ से आजिज़ आ गया पाकिस्तान?

वादे हैं वादों का क्या?
ज़रदारी ने हर वो चीज़ भुला दी जिस के दम पर वह मिस्टर टेन परसेंट से मिस्टर प्रेजिडेंट बने थे. यहाँ तक कि मोहतरमा बेनजीर भुट्टो की धरोहर भी जो उनकी कुल जमा पूंजी थी. अगर बेनजीर से उनकी शादी नहीं हुई होती तो ज़रदारी एक ज़मींदार से ज्यादा कुछ न होते. इनके कारगुजारियों के वज़ह से बेनजीर को देशनिकाला मिला और यह खुद जेल में रहे. पर बेनजीर की शहादत इनके लिए वरदान बन कर आई और इन्हें सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया. और वहां पहुँचते ही उन्होंने बेनजीर के सहयोगियों को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेकना शुरू किया. शेरी रहमान सिर्फ ताज़ा मिसाल हैं. शुरुआत तो मखदूम अमीन फाहिम से ही हो गयी थी जो बेनजीर के अघोषित राजनितिक उत्तराधिकारी थे जिन्होंने उनकी अनुपस्थिति में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को ज़िंदा रखा. उन्हें प्रधान मंत्री न बनाकर ज़रदारी ने युसूफ राजा गिलानी को चुना, जिन्होंने अब सेना से हाथ मिला लिया है क्यूंकि ज़रदारी से वफादारी की उम्मीद नहीं रही. हाल के समाचारों में आपने पढ़ा होगा कैसे बेनजीर के वफादार एक के बाद एक किनारे लग गए. लोगों की छोडिये, ज़रदारी ने सिद्धांतों तक को नहीं बख्शा. बेनजीर इस बात की लड़ाई लड़ रही थी के पाकिस्तान के संविधान में पुनः संशोधन कर राष्ट्रपति के हाथ से वह शक्तियां छीनी जाए जो संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री को बौना करती हैं. ज़रदारी खुद राष्ट्रपति बन बैठे और बेनजीर की लड़ाई को बौना कर दिया. जिस नवाज़ शरीफ के समर्थन से उन्होंने मुशर्रफ़ का तख्ता पलता और अपनी सरकार बनाई उसको भी गच्चा दे दिया. शरीफ की शर्त थी कि मुशर्रफ़ ने जिन जजों को रातोरात हटाया था उन्हें बहाल किया जाए. ज़रदारी इस से तब तक मुकरते रहे जब तक उनके जान पर ना बन आई.

कौन है अपना कौन पराया
सोनिया गाँधी ने भी राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के ज़्यादातर मित्रों को नकार दिया और यहाँ तक कि राजीव के कई दुश्मनों को अपना बना लिया. राजीव के करीबी रहे पत्रकार एम.जे. अकबर हों या अभिनेता अमिताभ बच्चन, सब आज सोनिया के आलोचकों में खड़े हैं. वहीँ राजीव को सत्ता से बेदखल करने वाले वी.पी. सिंह सोनिया के करीबी हो गए और उनके हत्यारे लिट्टे के समर्थक गठबंधन तक में आ गए. ज़रदारी और सोनिया में एक फर्क यह है कि सोनिया में राजनितिक सूझबूझ है और ज़रदारी इसमें जीरो हैं. पर सब से बड़ा फर्क है कि सोनिया गाँधी ने राजीव की धरोहर को बट्टा नहीं लगने दिया और राजीव गाँधी के नाम का दुरुपयोग नहीं किया. ज़रदारी ने बेनजीर की फोटो संयुक्त राष्ट्र तक चमकाई पर दिल ही दिल में वह 'बीबी बैगेज' से छुटकारा पाने की जुगत में रहे. यही कारण है कि बीबी के समर्थक अब शरीफ के पाले में जा रहे हैं. किसी को ज़रदारी के काईयाँ चरित्र पर भरोसा नहीं है. अमेरिका को भी नहीं जिसका शुमार पाकिस्तान के तीन आकाओं में आता है. आर्मी ने अपना भरोसा गिलानी पर जताया है और अल्लाह की तो अल्लाह जाने. पर अल्लाह के नाम पर जिहाद करने वालों का भरोसा तालिबान पर है. यही अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है और भारत के लिए भी.

अल्लाह मालिक
उत्तर भारत में अगर मौसम में अचानक परिवर्तन हो जाए तो मौसम विभाग इसका दोष पश्चिमी गड़बडियों या वेस्टर्न डिस्टर्बेंस पर मढ़ता है. भारत के पश्चिमी पडोसी का इतना असर है इस तरफ. ख़ास कर जब तालिबानी लडाके कुछ सौ किलोमीटर तक आ गए हों तो यह चिंता बढ़ना लाजिमी है. पर भारत सरकार ने अभी तक इसे सहजता से लिया है. और यह काफी हद तक सही भी है. तालिबान की लड़ाई से भारत को सिर्फ अप्रत्यक्ष खतरा है. प्रत्यक्ष खतरा पाकिस्तान और अमेरिका को है. अमेरिका की सेना इस क्षेत्र में लड़ रही है. पाकिस्तान की सेना अमेरिका के साथ लड़ रही है पर पाकिस्तान की जनता को इस्लामाबाद यह समझाने में विफल रहा है कि यह लड़ाई अमेरिका की नहीं पाकिस्तान की लड़ाई है. अनेक विश्लेषक इस बात को नहीं मानते पर असल में यह लड़ाई पाकिस्तान की ज्यादा है और अमेरिका की कम. अमेरिका तो कल यहाँ से चला जायेगा. तालिबान का शक्तिमान होना पाकिस्तान के वजूद के खिलाफ है. तालिबान शब्द एक ढीला ढाला लबादा है जो हम हर लडाके पर लगाने की ग़लती करते हैं. तालिबान बहुवचन है तालिब का जिसका सीधा मतलब है छात्र. मदरसों में पढने वाले यह छात्र पाकिस्तान की शह पर अफगानिस्तान के शासक बन बैठे थे. इन में ज़्यादातर पश्तून लोग हैं जो पाकिस्तान के वजूद में आने से पहले से ही अंग्रेजों द्वारा खिंची गयी डूरंड लाइन को नहीं मानते. यह रेखा उनको दो देशों में बाँट देता है. यह पश्तून खान अब्दुल गफ्फार खान के वक़्त से यह लड़ाई लड़ रहे हैं जो कभी कभी पख्तूनिस्तान की मांग के रूप में मुखर होता है. और इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है, जब तक पख्तूनिस्तान अस्तित्व में नहीं आता. अफगानिस्तान के ताजिक या उजबेक या हजारा तालिबान नहीं कहलाते. आज का तालिबान आन्दोलन पश्तूनों की लड़ाई है जो इस्लामाबाद के आधिपत्य को उतना ही नकारते हैं जितना काबुल के नेत्रित्व को. खान अब्दुल गफ्फार खान को अफगानिस्तान के जलालाबाद में दफनाया गया क्यूंकि जलालाबाद उनके लिए पेशावर से अलग नहीं था. सब पश्तूनों की एक ज़मीन थी और लड़ाई उस ज़मीन की है. उनको इस्लामाबाद नहीं चाहिए, उन्हें अपनी ज़मीन चाहिए.

तो फिर इलाज क्या है
पाकिस्तान को इंतज़ार है उस सुबह की जब शांति के कपोत उड़ान भरेंगे, बगैर इस भय के कि किसी एके-47 से तड़ तड़ निकलती गोलियाँ उन्हें धराशायी कर देंगे. आज की राजनैतिक अस्थिरता ख़त्म होती प्रतीत होती है पर गृहयुद्ध को ख़त्म होते बहुत देर लगेगी. जनरल जिया कहते थे कि भारत को हज़ार घाव देंगे जिन से इतना खून रिसेगा कि वह मर जायेगा. आम की टोकरियाँ फटी और जिया और न जी सके. आज उन का पाकिस्तान हज़ार नासूर पाले है. बलोच ताक़ लगाए बैठे हैं, सेना सीमान्त गाँधी के प्रान्त में घुटने टेक चुकी है, केंद्र-शासित कबायली इलाकों में कोहराम है और पंजाब और सिंध में कुलबुलाहट. ज़रदारी तो चन्द रोज़ के मेहमान हैं, सवाल आने वाले सालों का है जो इस मुल्क की हस्ती पर सवालिया निशाँ हैं. आगे आगे देखिये क्या रंग देखने को मिलते हैं. ग़ालिब कह गए थे.

ग़म-ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक