Sunday, May 24, 2009

छः से छक्कों की दरकार, एक-दो रन से जीत नहीं मिलेगी


प्रणब मुख़र्जी
कहने की ज़रुरत नहीं. दुनिया के हर वित्त मंत्री के सामने सब से बड़ी चुनौती है आर्थिक मंदी के वबाल से अर्थव्यवस्था को उबारना. यह चुनौती दुगुनी हो जाती है जब आपको दो महीने में बजट भी पेश करना हो. प्रणब दा के सामने अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने के लिए बहुत समय नहीं है. कुछ सेक्टर्स जो अभी तक विदेशी निवेश के लिए नहीं खोले गए थे, उनके लिए रास्ता साफ़ करना. धीमे होते विकास दर को फिर उकसाना. कल्याणकारी योजनाओं के लिए वोट मिला है, सो उसको तो जारी रखना पडेगा पर उसके लिए पैसे का इन्तेजाम करना है तो नए दरवाज़े तलाशने होंगे, खिड़कियाँ सिर्फ झाँकने के काम आती हैं. दरवाज़े खोलने का काम शुरू होता है अब.

शरदचन्द्र गोविंदराव पवार
विश्व भर में फैली मंदी से अगर हम ध्वस्त नहीं हुए तो उसका एक बड़ा कारण था कृषि में संतोषजनक प्रदर्शन. देश में अनाज का भंडार लगा है पर किसान अभी त्रस्त हैं.  एक किसान की आत्महत्या भी एक त्रासदी है और जब पंजाब जैसे संपन्न राज्य में किसान सल्फास खाने लगें तो चिंता स्वाभाविक है. पवार साहेब के अपने राज्य महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पिछले कार्यकाल में बड़ा मुद्दा था. एक दो राज्यों को छोड़ दें तो हमारी कृषि में आधुनिक तकनीक का उपयोग नगण्य सा है. कृषकों को सम्मान, उचित दाम और कृषि में तकनीक को बढावा देना समय की मांग है. इस के लिए पवार साहेब को महाराष्ट्र के मांग से ऊपर उठना होगा.

अरक्पराम्बिल कुरियन एंटनी
भारत अपनी सैन्य क्षमता का चाहे जितना डंका पीट ले, हमारी सेना दुश्मन से ज्यादा अपनी समस्याओं से जूझ रही है. वेतन और पेंशन को लेकर असंतोष अपनी जगह है, हालत ऐसे हैं कि अब गोले बारूद और हथियारों की कमी तक सता रही है. रक्षा सौदे की ज़मीन बड़ी फिसलन भारी है उस पर कीचड़ ऐसा कि पिछले कई सालों में रक्षा सौदे इस के दर से लटके रहे. एंटनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है थल, जल और वायु सेना को उनकी ज़रुरत के सामान दिए जाएँ. चीन के मोतियों की माला में घिरे भारत के सामने पाकिस्तान के आण्विक हथियार संवर्धन में आई तेजी से निपटना बड़ी चुनौती है.

पलनिअप्पन चिदंबरम
शिवराज पाटिल जब २००४ में गृह मंत्री बने तो उन्होंने माओवादियों के खिलाफ संघर्ष विराम की घोषणा कर दी. कहा बातचीत से समाधान निकलेगा. गांधीवाद और माओवाद के बीच की दूरी पाटी नहीं जा सकी और उनका कार्यकाल रक्तरंजित रहा. फिर सीमा-पर समर्थित आतंकवाद, घरेलु आतंकवाद बम बनकर फटे इस देश की छाती पर. पाटिल साहेब के दामन पर जब दाग लगे तो वह अपना सफारी सूट बदल लेते थे. चिदंबरम जब शपथ ले रहे थे तब महाराष्ट्र में १६ घरों में मातम था. ये उन पुलिसकर्मियों के घर थे जो एक दिन पहले गढ़चिरौली में नक्सलियों के हाथ मारे गए थे. गढ़चिरौली महाराष्ट्र का वह जिला है जो तथाकथित रेड कॉरिडोर पर है. यह लाल गलियारा नेपाल से लेकर कन्याकुमारी तक कैसे खींचता गया, हमारे नीति-निर्धारकों की असफलता की कहानी है. चिदंबरम की सबसे बड़ी, हाँ आतंकवाद से भी बड़ी, चुनौती है माओवाद का बढ़ता प्रभाव. बात सिर्फ बन्दूक से नहीं बनती पर बन्दूक का जवाब हमेशा बातें नहीं हो सकती.

ममता बनर्जी
ममता दीदी या तो रेल में बैठेंगी या रायटर्स बिल्डिंग में.  उन्होंने रेल से कोल्कता का सफ़र शुरू किया है पर उनको यह याद रखना पड़ेगा कि वह भारत की रेल मंत्री हैं, पूर्व रेल की नहीं. उनके पहले के बहुत रेल मंत्री इस तथ्य को भूल जाते थे. लालू राज में मुनाफा शब्द रेलवे का मन्त्र बन गया था. इस को मैनेजमेंट स्कूलों में जगह मिल गयी पर रेलवे की दुर्दशा पर किसी का ध्यान नहीं गया. आज भी सर्विस और जान माल की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं.  खस्ताहाल पटरियाँ, मरियल डिब्बे और दुर्घटनाएं दुनिया की सबसे बड़ी रेल व्यवस्था पर दाग हैं. लोकप्रियता राजनीतिकों की मजबूरी है पर हमारे देश में अभी भी ग़रीबों को ट्रेन में लकडी के पट्टों पर बैठना पड़ता है. गरीब रथ ठीक है पर बाकी को कम से कम आरामदायक तो बना दो. 

सोमानाहल्ली मल्लाय्या कृष्णा
बहुत बुरे फंसे हैं हमारे वोक्कालिगा लीडर. कर्नाटक की राजनीति वैसे कम कठिन नहीं है पर ओबामा के अमेरिका में कुछ पक रहा है. इसका टेस्ट तो नहीं मालूम पर कढाई से जो गंध आ रही है, हमारे नथुनों को नहीं भा रही है. बुश के समय में जो सब पुश हुआ था वह सब फुस्स ना हो जाए इसका डर साउथ ब्लाक में कईयों को सता रहा है. पाकिस्तान के साथ डिप्लोमेसी को आतंकवाद का नाग सूंघ गया है और यूरोप में सब आपस में व्यस्त हैं. चीन ने अफ्रीका में अपना वर्चस्व सा बना लिया है और मंदी से जूझते बाकी विश्व के स्मृति पटल से भारत उतरता जा रहा है. नेहरु जी की नीतियों को कोसने वाले भी मानते हैं कि दबे कुचले देशों का नेत्रित्व भारत के हाथ में होने से दुनिया को हमारी ज़रुरत आन पड़ती थी. अब हम आर्थिक, सामरिक रूप से मजबूत हुए हैं पर दुनिया की राजनीति में लीडरशिप तो दूर पिछलग्गू वाली स्थिति आ गयी है. कृष्णा को अपनी बाँसुरी पर कुछ ऐसे धुन छेड़ने पड़ेंगे कि हमको कश्मीर और बंगलोर के अलावा अन्य कारणों से भी जाना जाए.   

1 comment:

जगदीश त्रिपाठी said...

सर, ब्लाग के लिए कुछ अलग से भी लिखें. कम से कम सप्ताह
में एक बार जरूर. उम्मीद है कि बाकी मंत्रियों के बारे भी उनकी
ताजपोशी के बाद पढ़ने को मिलेगा
शब्द पुष्टिकरण हटा लें तो पाठकों को सुविधा होगी।