Sunday, January 29, 2012
बिन डेरे हम तेरे
लोरी सुनो पर जागते रहो* *शर्तें लागू
यूपी में अभी-अभी बीजेपी का घोषणापत्र ज़ारी हुआ है, उसमें मुलायम सिंह के लैपटॉप के बदले लैपटॉप का वादा किया है. इस प्रतियोगिता की शुरुआत तब हुई जब केन्द्र सरकार ने आकाश टैबलेट को कांग्रेसी अचीवमेंट बना कर दिखाना शुरू कर दिया. जिस मुल्क के कई खित्ते अभी स्कूल का मुंह नहीं देख पाए हैं, उस मुल्क में १,००० रूपए का टैबलेट एक गोली नहीं तो क्या है. आईआईटी जोधपुर, जिसने आकाश प्रोजेक्ट का बीज बोया था, उसने भी आकाश को फेल करार दिया है. कम्प्यूटर के शोर में असली मुद्दों की आह सुनाई नहीं दे रही, पर चुनाव के बाद उनका सामना तो करना ही पड़ेगा.
यूपी को पहले स्कूल चाहिए, ६५ फ़ीसदी बच्चे स्कूल से बहुत दूर हैं, जहाँ स्कूल है वहाँ लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट चाहिए, क्योंकि अक्सर ऎसी दिखने-में-छोटी ज़रूरतों के चलते लड़कियों की पढ़ाई रुक जाती है. ऐसे हजारों स्कूल हैं जहाँ छत नहीं, छत है तो टीचर नहीं. टीचर है तो वे अपनी सैलेरी के लिए हड़ताल पर हैं. सरकार उनसे कहती है पैसे पेड़ पर तो उगते नहीं, कहाँ से दें. पैसे किसान उगाते हैं पर उनको उतने पैसे नहीं मिलते जितने का पसीना खेत सोंख जाता है. मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ नहीं सकती क्योंकि सरकार कहती है पैसे पेड़ पर नहीं उगते. अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो दवा नहीं, दवा है तो नकली है, असली है तो उसमें एनएचआरएम घोटाला है. फिर भी यूपी जैसे गरीब राज्य में पार्टियां लैपटॉप बांटने को आतुर है. भले ही राज्य कर्जे पर ब्याज का भुगतान करने के हालात में नहीं. क्योंकि चुनाव के वक्त हम वादों की चकाचौंध में बहुत कुछ देख नहीं पाते और आरोप-प्रत्यारोप के शोर में कुछ सुनाई नहीं पड़ता.
अपने पंजाब के हालात देखिए. कांग्रेस शिरोमणि अकाली दल पर आरोप लगाती है कि राज्य पर ७८००० करोड़ का क़र्ज़ हो गया है, मानो ये क़र्ज़ सिर्फ एक सरकार ने लिया हो. १९९७ में कांग्रेस सरकार गई तो पंजाब पर क़र्ज़ था १२,००० करोड़, जब २००२ में अकाली गए तो वह दुगुना हो गया यानि २४,००० करोड़, फिर जब आई कांग्रेस आई तो ये कम नहीं हुआ, बल्कि 2007 में जाते जाते क़र्ज़ दुगुना हो गया यानि ४८,००० करोड़. क़र्ज़ का घी पीना राजनीतिक परंपरा है.
बैंक क़र्ज़ देने से हाथ खड़े कर रहे हैं. वह भी भारत के सबसे खुशहाल राज्य को. क्योंकि आर्थिक नीतियां पंजाब-केंद्रित नहीं हैं, वोट-केंद्रित हैं. जिस राज्य के विकास दर से अन्य राज्य सीख लेते थे, उसका विकास दर ६ प्रतिशत से नीचे है. पड़ोस के हरियाणा का ११ प्रतिशत है. हिमाचल जैसे दुर्गम राज्य का ९.५ फ़ीसदी है और झारखण्ड जैसे भ्रष्ट-त्रस्त राज्य का ९.८ फ़ीसदी है. मुफ्त की बिजली ने पंजाब बिजली निगम की कमर तोड़ दी है जिसे किश्तों के भुगतान होने का टोटा है. ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. ये एक बुरा सपना है जिस से जागना ज़रूरी है. राज्य को जगाने की ज़िम्मेदारी जिनकी है वह जनता को लोकलुभावन लोरी सुना कर सुला देना चाहते हैं. बस आप जागते रहिए. वोट उन मुद्दों पर दीजिए जो असली मुद्दे हैं. वोट बिजली पैदा करने के लिए दीजिए, मुफ्त की बिजली के लिए नहीं. वोट रोज़गार पैदा करने वाली नीतियों के आधार पर कीजिए, सरकारी रोजगार योजनाओं या नौकरी के नाम पर नहीं. वोट महंगाई कम करने वाली नीतियों पर दीजिए, मुफ्त के राशन पर नहीं. निचले स्तर पर भ्रष्टाचार खत्म करने के उपायों को देखिए, ना कि वादों को. सरकार जिनकी भी बने उनको राज्य की प्राथमिकताएं सुशासन के चश्मे से देखनी पड़ेगी, क्योंकि पंजाब को तेज आर्थिक विकास की पटरी पर वापस आना है. आप उसे चुनिए जो यह कर सके. सही को चुनिए.
Thursday, October 14, 2010
Wednesday, August 11, 2010
Superbug and super-prejudice
पश्चिम का पूर्वाग्रह और एक जीवाणु
मेडिकल रिसर्च की पत्रिका लैंसेट ने संक्रामक रोगों पर अपने हालिया विशेषांक में चेतावनी दी है कि एक ऐसा जीवाणु जिसे सुपरबग नाम दिया गया है, ब्रिटेन और अमेरिका में तेज़ी से फैल सकता है. इस सुपरबग या यूं कहें महाजीवाणु पर किसी एंटी-बायोटिक का असर नहीं होता. यानि इस से संक्रमित रोगी का इलाज बेहद मुश्किल हो सकता है. इस नई शोध की खबर से चिंता की लकीरें भारत में भी फैलेंगी क्योंकि शोध के अनुसार ये जीवाणु भारत से ही दूसरे देशों में गए हैं.शोधकर्ताओं का कहना है कि सस्ते इलाज के लिए पश्चिमी देशों के कई लोग भारत या पाकिस्तान जैसे देशों में जाकर इलाज करवाते हैं, जहाँ से वह ये सुपरबग लेकर घर लौट रहे हैं और पश्चिमी देशों में फैला रहे हैं. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में भारत के दो डॉक्टरों ने यह कहा कि भारत में चूँकि ड्रग नियंत्रण कमज़ोर है ओर एंटी-बायोटिक्स का दुरूपयोग स्व-चिकिस्ता में करते हैं तो ऐसा तो होना ही था. मतलब ये कि हमने भी इस रिपोर्ट को हाथों हाथ लिया है.
भारत को इसे आड़े हाथों लेना चाहिए. हमें इस शोध की शोध करना चाहिए और इसका सत्यापन करने के बाद ही सहयोग करना चाहिए. इसमें कोई बुराई नहीं कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियों और उपमहाद्वीप के जीवाणुओं पर पूरी दुनिया रिसर्च करे. पर इस रिपोर्ट की इमानदारी पर शक होना भी अस्वाभाविक नहीं होगा. भारत में मेडिकल टूरिजम को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने नीतियां निर्धारित की हैं. हमारे डॉक्टर दुनिया के शीर्ष डॉक्टरों में आते हैं और हमारी मेडिकल शिक्षा को भी सम्मान की नज़र से देखा जाता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पश्चिम के लोगों को भारत में इलाज करवाने से हतोत्साहित किया जा रहा हो? पश्चिम की मेडिकल लॉबी इस पर बहुत वक्त से काम कर रही है. लैंसेट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान पर ऊंगली उठाए बिना भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को इस विषय पर हमारे विशेषज्ञों से राय लेनी चाहिए. कहीं यह हमारे बढ़ते मेडिकल पर्यटन पर चोट पहुँचाने की कोशिश तो नहीं. क्योंकि ये सुपरबग का पूरा मामला पहली नज़र में पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है.
यह बैक्टेरिया एक ऐसा एंजाइम पैदा करता है जो एक बिलकुल नया जीन है. यह एक जीवाणु की दवाओं से लड़ने की शक्ति बढ़ाता है. इस एंजाइम का नाम है एनडीएम-१. अब ज़रा इसके फुल फॉर्म पर नज़र डालिए. इसका पूरा नाम है न्यू डेल्ही मेटालो बीटा लैक्टमेस-१. जब भी इस जीवाणु की खोज हुई इसका नाम भारत की राजधानी पर क्यों रखा गया? अगर हम यह मान भी लें कि इसके रोगी भारत, पाकिस्तान या बंगलादेश होकर आए थे, तो भी एक जीवाणु का नाम नई दिल्ली के नाम पर क्यों? क्या कोई मेडिकल टर्म नहीं मिला? क्या इसे साउथ एशियन नहीं कहा जा सकता था? इसके नाम से ही पश्चिम के पूर्वाग्रह की बू आती है. और इसीलिए लैंसेट के इस रिपोर्ट को हमें हाथों हाथ नहीं, आड़े हाथों लेना चाहिए.
ब्लैकबेरी या ब्लाकबेरी?
कनाडा की ब्लैकबेरी भारत समेत पूरी दुनिया के टॉप कॉर्पोरेट अधिकारियों के लिए कीमती गहने जैसा है. उसके बिना वह दिखें तो अपने आप को अधूरा महसूस करते हैं. ब्लैकबेरी मीन्स बिज़नेस. उसी ब्लैकबेरी पर काले बादल छाए हुए हैं. भारत सरकार का कहना है कि अगर ब्लैकबेरी सुरक्षा एजेंसियों को अपने सर्वर को छानने की छूट नहीं देता तो उसकी सेवाओं पर प्रतिबन्ध लग सकता है. ब्लैकबेरी अपने इमेल और इंस्टेंट मेसेजिंग के लिए जानी जाती है, जो सेवा अब हर दूसरे फोन में उपलब्ध है. पर ब्लैकबेरी में एक फर्क है. रिसर्च इन मोशन नाम की कनेडियन कंपनी द्वारा बनाए जाने वाले इस फोन में ईमेल का भेजना या रिसीव करना ब्लैकबेरी सर्वर से होकर है. जो कनाडा में है. फोन से इंस्टंट मैसेज या इमेल जब निकलता है तो वह कोडेड होता है और उसका इनक्रिप्शन बहुत उच्च कोटि का है. वह बीच में कहीं इंटरसेप्ट हो भी जाए तो उसे डिकोड करना मुश्किल है. भारत सरकार का कहना है कि आतंकवादी इसका उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में कर सकते हैं. रिसर्च इन मोशन का कहना है वह डिकोड करने की इजाजत नहीं दे सकता, क्योंकि इस से उसके कॉर्पोरेट उपभोक्ताओं कि प्रायवेसी भंग होती है.
पर उसका ये उपभोक्ता प्रेम सिर्फ भारत के मामले में ही क्यों जागता है, यह ब्लैकबेरी के अफसरान नहीं बता रहे. अमेरिका को एक्सेस देने में उन्हें यह याद नहीं आया, चीन ने कान मरोड़ी तो तुरंत सर्वर चीन में लगा दिया, सउदी अरब को भी इंस्टंट मैसेज को डिकोड करने की सुविधा दे दी. अपने देश कनाडा में तो ये सुविधाएं सरकार को दे ही दीं. भारत कोई बनाना रिपब्लिक तो है नहीं जो अपने सारी कॉर्पोरेट कंपनियों के हर ईमेल को छाने. हम एक लोकतान्त्रिक देश हैं और हमारे यहाँ व्यवसाय करने के लिए हमारे कानूनों की परिधि में काम करना होगा. जब आईफोन, एंड्रोइड और सिम्बियन जैसे लोकप्रिय प्लेटफोर्म पर फोन बनाने वाली कंपनियों ने सुरक्षा के मुद्दों पर भारत के कानून के दायरे में काम करना स्वीकार किया है तो ब्लैकबेरी क्यों नहीं? वैसे भी यहाँ की कंपनियों के सारे इमेल ब्लैकबेरी से ही नहीं चलते, सबके अपने सर्वर हैं. भारत के साथ अकड़ और अमेरिका के साथ लचर, ये कौन सी प्रायवेसी है?
राव के सर ठीकरा
जब भोपाल गैस कांड हुआ था तब अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री थे और नरसिम्हा राव गृह मंत्री. तब यूनियन कार्बाइड के मुखिया और कांड के मुख्य अभियुक्त एंडरसन को भारत से सहर्ष विदाई देने में अर्जुन सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई थी. बीस हज़ार लोगों की जान गई और आज भी एंडरसन अमेरिका में खुले आम घूम रहा है. बहरहाल जब न्याय आया तो देश में अन्याय की चीख उठी. अर्जुन सिंह नहीं बोले. कल बोले तो उन्होंने सारा दोष राव पर मढ़ा. राजीव और राव दोनों इस दुनिया में नहीं हैं, उनके आरोपों का जवाब देने के लिए. अर्जुन सिंह ने राव को चुना क्योंकि राव का परिवार उनको और उनके परिवार को राजनीतिक नुकसान पहुँचाने की स्थिति में नहीं है. राजीव गाँधी का नाम लेते तो कोई अर्जुन का नामलेवा नहीं रहता.
बड़े बेआबरू
कलमाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले में गले तक धंसे हैं पर अभी भी तने बैठे हैं. उनके सिपहसालार टी.एस. दरबारी बर्खास्त हो चुके हैं और अब जो कुछ खुलासे कर रहे हैं उस से कलमाडी की जान सांसत में है. दोस्त दोस्त ना रहा... ये गाना राग दरबारी में नहीं है पर कलमाड़ी को तो ऐसा ही लग रहा होगा. और कलमाडी की राग जयजयवंती अब ज्यादा देर तक कोई सुनेगा नहीं. इस कूचे से निकालना तो है ही, पर उन्होंने ठान राखी है कि बेआबरू हो कर ही निकलेंगे.
Tuesday, May 25, 2010
खाप का पाप: Sins of the Khap and uber-urban modesty ablaze
Friday, April 23, 2010
हसीना का पसीना और पॉकेटमारों की चाल
हमारे देश के मेले मजमों में, बड़े शहरों के बस स्टैंड या रेलवे स्टेशनों पर उचक्के-उठाईगीर गैंग बना कर काम करते हैं और अगर कोई पकड़ा जाए तो उसको छुड़ाने का भी उनका अपना देसी तरीका होता है. अगर किसी की जेब तराशते कोई धरा गया और गैरमजरुआ धुनाई की संभावनाएं प्रबल हो गईं तो उसके साथी उसको बचाने के लिए उसी पर पिल पड़ते हैं. उसे तमाचे रसीद करते हैं और कान पकड़ कर ये कहते खींचते चलते हैं कि चलो पुलिस थाने में तेरी मरम्मत करवाता हूँ. उसके शिकार और पब्लिक धुनाई में भागीदार हाथ मलते खुश होते हैं कि चोर पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उनको भनक तक नहीं लगती कि मौसेरे भाई उसे बचा ले गए. कुछ माँ बाप भी ऐसा करते देखे जाते हैं अगर लाडला किसी गैर घर का शीशा तोड़ते पकड़ा जाए. वे हलके हाथों से अपने बच्चे को खुद मारना पसंद करते हैं ताकि पड़ोसी की बुरी नज़र और निर्मम हाथ उस पर ना पड़ें.
Thursday, February 04, 2010
Tigers do, dogs do ... Mumbai micturated
Uddhav Thackeray says Rahul Gandhi must retract his statement about Mumbai belonging to all Indians, else he would not be allowed into Mumbai in future, clearly marking his territory.
In jungles, tigers are known to mark their territory by leaving their smell by excreting or . In , dogs can be seen lifting a hind leg against walls, car tyres and electic poles to do the same. Laws of the jungle, you know! Thackerays do not go out of Mumbai, not even to parts of Maharashtra. They remain inside their Dadar stronghold and bark at folks living in Bandra. They beat up Biharis and UP wallas. I hardly remember Bal Thackeray travelling to any other part of India. If my memory serves me right, he has visited Delhi only once in past many years. And we are told the world is small place. That we live in a freaking global village. In a country where boundaries have disappeared because of needs of economy and better means of travel, a family is redrawing boundaries. And we need their permission!
The Congress in its zeal to see the Sena divided allows both the young Thackerays to fight and prove who can do maximum damage to Maximum City. It's a turf war between two cousins that may cost India its founding principles. The basic idea of India is that people who speak different languages can live together in harmony. That unity in diversity is under attack by two cousins and we can do nothing about it. It's not Congress's shame. It must ashame all of us.
That a bunch of hoodlums can slur Shah Rukh Khan because he, a Muslim, dared inviting Pakistani players is a national shame. That a political party with an increasingly minor following can bar citizens from other parts of the country from seeking in employment in Mumbai must reflect upon all of us. That a family decides which feature film can be shown in theatres has been a burden that we all must bear.
We keep blasting Australia for racist attacks on Indians Down Under. We have no blasted ability to stop the same right here, on our soil. The attacks are not on Shah Rukh Khan or so-called north Indians. It's an attack on India and is potentially far more dangerous that the non-state actors from Pakistan inflict upon us. Pakistani terrorists kill Indians, Thackerays try to kill India, the very idea of India.
Wednesday, February 03, 2010
तालिबान से सौदा उलटा पड़ेगा
अफगानिस्तान में खूनी संघर्ष से निकलने की ख्वाहिश बराक ओबामा पर हावी होती जा रही है. उन्होंने वहां से अमेरिकी फौज वापस बुलाने की तारीख भी तय कर दी है पर युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ. तालिबान और ओसामा बिन लादेन का अल काईदा नेटवर्क अभी भी ज़िंदा और खतरनाक हैं. पर अपनी जनता को किये गए वादे के चक्कर में अमेरिका अफगानिस्तान की जनता की फ़िक्र छोड़ रहा है. पिछले हफ्ते लन्दन में हुए अफगानिस्तान कांफेरेंस में यह स्पष्ट हो गया कि तथाकथित भले तालिबान से बातचीत शुरू की जायेगी और शांति नहीं तो समझौते का भ्रम पैदा कर अमेरिका और ब्रिटेन अफगान पचड़े से हाथ खींच लेंगे. अफगानिस्तान का भारत के हितों से सीधा राब्ता है और अब भारत पर दबाव है कि उन हितों की अनदेखी कर वह पश्चिमी ताकतों के साथ हो ले. दबाव किस कदर होगा इस का अंदाजा इस बात से हो जाता है कि विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से यह उगलवा लिया गया कि भारत "भले" तालिबान से बातचीत के पक्ष में है. उस भले तालिबान का चरित्र कैसा होगा इस का अंदाजा उसमें शामिल मुल्ला मुत्तवकील भी हैं जिन्होंने कंधार विमान अपहरण कांड में भूमिका निभाई थी. तब तालिबान-शासित अफगानिस्तान में मंत्री थे और ऊपरी तौर पर भारत और अपहरणकर्ताओं के बीच मध्यस्थता कर रहे थे. पर सारे राज़ खुले तो पता चला वह और उनका पूरा तालिबानी तंत्र आतंकियों से मिला हुआ था. उस तालिबान से बात करने का मतलब यह है कि उन्हें काबुल की सत्ता में साझेदारी देना, जो भारत के हित में कतई नहीं है. दूसरी बात तालिबान के बहाने पाकिस्तान और आईएसआई फिर से काबुल पर अपना नियंत्रण बना लेंगे ताकि सारी ऊर्जा भारत को रक्तरंजित करने में लगाई जा सके. यह जग जाहिर है कि अफगानिस्तान की ज़्यादातर जनता भारत को अपना मित्र मानती है और पाकिस्तान को अफगानिस्तान की आतंरिक मामलों में दखल देने वाला पड़ोसी.
अमेरिका की योजना में तथाकथित "भले" तालिबान को पैसे दे कर अपनी तरफ करना भी है. यह सौदा अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के उन शहीदों का अपमान है जिन्होंने तालिबान से लड़ने में अपने प्राण त्याग दिए. यह उन हज़ारों अफगान नागरिकों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने तालिबान के खिलाफ जंग में अपना सब कुछ गँवा दिया. यह भारत की पीठ में भी छुरा है जिसने अफगानिस्तान में आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में अपने नागरिकों की बलि दी और करोड़ों डॉलर खर्च किये. पाकिस्तान ने इस युद्ध में पैसा कमाया है और वह इस का अंत काबुल में इस्लामाबाद का एक पिट्ठू बिठाना चाहता है. ओबामा ने जो पासा फेंका है वह अमेरिका के लिए उलटा पड़े ना पड़े भारत के लिए उलटा ही पडेगा. भारत को तालिबान से बातचीत या सौदा कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए और अमेरिका को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि वह अपने स्वार्थों के लिए भारत के हितों को दरकिनार नहीं कर सकता. सत्ता में साझेदारी तालिबान को और मजबूत करेगी, जो ना अमेरिका के हित में है ना भारत के. यह अल काईदा और पाकिस्तानी आईएसआई के हित में है.
Monday, February 01, 2010
आज तक कोई भी रहा ही नहीं
If we accuse Gulzar of plagiarism for “Ibn-e-Batuta” then he is never been original. The hugely popular Kar thaiya thaiya is by Bulle Shah. The opening lines of “Dil dhoondhta hai phir wahi fursat ke raat din” is lifted in its entirety from a ghazal by Ghalib titled “Muddat huii hai yaar ko mehmaan kiye hue”. Yet I would recognize it as a Gulzar song and it will remain a Gulzar song. Because he has written it. Period. In fact, Ghalib’s kaafiyaa has been used by poets from Faiz to Gulzar as they weave their own words around the great man’s words to create poetry that resonates with original thought and déjà vu. This is a tradition in Hindustani poetry that goes back to the origins of Hindustani poetry.
And most readers understand the obvious yet subtle tributes. They are never called a tribute to X or Y. I am reminded of many films where great filmmakers pay tributes to past masters or people they admired by designing a scene around a memorable scene from the past. They don’t subtitle it as this scene is a tribute to X. They expect the viewer to understand and rejoice in it.
No one went to Gulzar and asked him before throwing dirt at him. He would have told them of tens of his own work lifted from popular folk or poetry of the great masters. That’s one of the problems with journalism today, an industry I am part of. But it goes beyond this. Ahmed Faraz wrote a heart-breaking nazm about sectarian violence in Pakistan titled Ae mere Logo. Now, we had a patriotic song called Ae mere watan ke logo, immortalized by Lata. Should Faraz credit the songwriter because three words are common? Both these works are entirely different in their treatment and purpose. My answer is no. In Ibn-e-batuta case, it’s so obviously a tribute to Saxena’s poem for kids. By that logic, Jai Ho is too similar to Jai he by Ravindranath Tagore. And the Lage Raho Munnabhai song "Bande mein tha dum" should be attributed to Bankim Chandra Chatterjee for the words Vande Mataram. And "Chal Akela Chal Akela" by Mukesh was a Tagore song.
Pity, Gulzar writes for films where too many thieves masquerade as originals. It is easier to cast aspersions on Bollywood because there are too many phonies inhabiting that world. Gulzar is a misfit and his white kurta is tainted because of this association. Piyush Mishra played around the Jinhein naaz hai Hind par wo kahan hain in Gulaal to perfection. It was an original. But then with people in mood to attack Gulzar for Ibn-e-Batuta, he should hide.
Gulzar ko to bakhsh do
अगर ऐसा है तो फिर चल छैयां-छैयां के लिए बुल्ले शाह के साथ क्रेडिट बांटने की आवाज़ क्यों नहीं उठी या फिर दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन जिसका मुखडा ग़ालिब के मुद्दत हुई है यार को मेहमान किये हुए ग़ज़ल का एक शेर है. यह बात गुलज़ार ने छुपाई नहीं पर हिन्दुस्तानी रचनाओं में ग़ालिब के शब्दों में "अगले ज़माने के" कृतियों को आगे ले जाने की परम्परा है. उस हिसाब से "जय हो" शब्द हमारे लोक काव्यों से लेकर कई साहित्यिक रचनाओं में इस्तेमाल हुआ है, फिर गुलज़ार किस के साथ इस का ऑस्कर बांटें. कुंवर महेंद्र सिंह बेदी का उर्दू गज़ल की दुनिया में अपना रूतबा है पर उन्होंने फैज़ के काफिये को पकड़ पूरी गज़ल लिख दी और उस महान फैज़ ने भी ग़ालिब की ग़ज़लों में अपने मजमून ढूंढे. हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहिब ने थोमस मूर की कविता "द लाईट ऑफ अदर डेज़" का अनुवाद किया और वह अनुवाद "अक्सर शबे तन्हाई में" मूर की कविता से अलग और कई मायनों में बेहतर हो गया. अक्सर शबे तन्हाई में मिर्ज़ा की सृजनशीलता कस कस कर भरी है, आज पढ़ने वाले मूर की कविता को प्रेरणा भर मानते हैं. गुलज़ार फिल्मों में लिखने के कारण मारे गए. दर असल हमारी फिल्मवालों ने प्रेरणा के नाम पर इतनी चोरियां की हैं कि हमें यकीन नहीं होता कि काजल की कोठरी में किसी का कुर्ता सफ़ेद बचेगा. यकीन का मरना अच्छी बात नहीं है.
Monday, January 25, 2010
Rock is On! Hail Arjun.
You are jealous. Especially those of you who are actors. But now acting is not actor's only territory. In a democracy like ours, everyone has the right to act and win a national award. You hate Arjun because he did it. You laugh at him because you know he cannot laugh or cry on screen. He is a method actor, only you don't know the method. His family is family friends with the Khans who are family friends of first family of the country. The first family controls the government that runs the nation. It's family first in the first family. Well, well, you can now link it all and make baseless allegations and indulge in gossip.
Wednesday, December 30, 2009
नौ के नश्तर बहुत हुए, दस में बस हो
Wednesday, December 23, 2009
झारखंडित जनादेश
Tuesday, December 22, 2009
Freeloading is approved!
Wednesday, December 16, 2009
Goaah, Ouch!
From being a hippie destination in the Seventies, Goa has come a long way to become the prime holiday destination for Indians and foreigners alike. December and January are the months when the tourism season at its peak. But this December, a cloud of doubt hangs over the tourism industry in Goa. Not because domestic or foreign travelers are keeping away, but because the rising crime against tourists has triggered a debate which is unintelligible and Goa politicians are making claims which the civil society finds outrageous. Goa's tourism minister wrote to his boss, the chief minister, that if law and order is not strengthened Goa may well become the rape capital of India. Chief Minister Digamabar Kamat's reply was shocking to say the least. He said tourists are equally to blame for crime against tourists, especially women. They should be careful as to not mix with the local populace and dress appropriately. Congress MP from the state scandalized the Rajya Sabha by hinting that recent victims of rape had invited it upon themselves. Some members of the august house were furious at this insinuation and termed it a misogynist idea to blame rape victims for rape. The National Commission for Women criticized him and the Russian consulate said they do issue travel advisories to its nationals but Naik had crossed the line. A Russian woman was recently raped in Goa and the police initially refused to register a case, saying the woman should not have gone with a man in the dark of the night. A similar argument was made when British teenager Scarlett Keeling was raped and murdered. Giving out advice to tourists is not wrong but before blaming the victims, the lawmakers and the law-keepers must take a good look at the law of the land. A husband can be charged with rape if the woman has not given consent. Violation of anyone under 16 is considered rape in the eye of the law. It does not matter whether the victim was walking with the offender or friends with him. A rape is a rape.
What Kamat said is not entirely rubbish. The government must warn tourists against dangers and possible threats in Goa. It should also advise tourists about appropriate dresses for places. That's part of the government's job. But the government must make residents and visitors confident about their security. That's the government's job too. Kamat and Naik should know that crime is committed only when the criminal thinks he can get away with it. It is not decided by the clothes on the victim but the lack of fear of law in the offender's mind. Goa politicians need to stop talking and start working. The state's prime industry is at stake, its image is being shredded in public. They should assure tourists of their safety and not scare them. And for that, they need to secure justice for the victims. A promise to act is any day better than an excuse to not act.
Wednesday, December 02, 2009
ओबामा के सपने
राष्ट्रपति बराक ओबामा के नए अफगान-पाकिस्तान रणनीति की घोषणा में नया कुछ नहीं है. यह अमेरिका की दोमुंही नीतियों का एक और दस्तावेज है, जिसमें युद्ध के अमेरिकी समर्थकों को ३०,००० और सैनिक भेजकर खुश किया गया, वहीं युद्ध के विरोधियों को अफगानिस्तान से वापसी की एक तारीख थामकर शांत किया गया. कल के एक सर्वे में पता चला युद्ध के समर्थक घट कर ३५ फीसदी रह गए हैं. और 55 फ़ीसदी अब इस खूनी खेल का अंत चाहते हैं जिसने 800 अमेरिकियों की जान और 200 बिलियन डॉलर लील चुका है. विर्दोहियों में ज़्यादातर ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं. यह अमेरिका के लोगों के लिए दोमुंहा सन्देश था. कुछ ऐसा ही सन्देश पाकिस्तान को दिया गया है. स्पष्ट है अब ओबामा ने अपनी सेना को युद्धक्षेत्र पाकिस्तान के भीतर तक ले जाने को हरी झंडी डे दी है. वहीं पाकिस्तान को और मदद और हथियार की पेशकश भी कर दी गई. जिस आमूल परिवर्तन की बात ओबामा ने अपने प्रशासन के शुरुआती दिनों में की, वह इस रणनीति में नहीं दिखती. जोर्ज बुश राष्ट्रपति नहीं रहे पर ओबामा कितने अलग हैं, यह un ३०,००० सैनिकों की तैनाती के बाद पता चल जाएगा. अमेरिका का सबसे लंबा युद्ध अगले 18 महीने में ख़त्म कैसे होगा जब 8 साल में तालिबान मजबूत होता दिख रहा है? यह सवाल जायज़ है पर इसके जवाब के लिए इंतज़ार ज़रूरी है. पर उस सवाल का क्या करें जो इस पुरी रणनीति पर सवाल खड़ा करता है. आप सैनिकों की वापसी का तारीख देकर कोई युद्ध कैसे जीत सकते हैं? सनद रहे, यहाँ अमेरिका किसी देश की सेना से आमने सामने नहीं है. तालिबान गुरिल्ला युद्ध कर रहे हैं? जब तालिबान को यह पता हो कि अमेरिका जुलाई २०११ में सब कुछ छोड़ वापस जाएगा, तो वह अगले १८ महीने अपने गुफाओं में काट लेंगे. अमेरिकियों के जाने के बाद फिर काबुल हथिया लेंगे. तो क्या घरेलु युद्ध विरोधियों को खुश करने में ओबामा ने एक बड़ी भूल कर दी है? इन सब जवाबों के पहले अमेरिका को यह समझ लेना चाहिए कि वह किसी शत्रु देश को कराने नहीं निकले हैं. वास्तविकता यह है कि अफगानिस्तान ही एक देश नहीं. यह वह ज़मीन है, जो कबीलाई समाजों से बना है और यह ज़मीन कई आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के कारण देश कहलाने लगा है. वहां लोकतंत्र की सफलता का हाल हालिया चुनावों में ज़ाहिर हो गया. उस देश के सामजिक और शासनात्मक स्थिति यह नहीं है कि वहां लोकतंत्र सफल हो. उनका लोकतंत्र लोया जिरगा तक सीमित है. सोवियत रूस ने उन्हें जबरन एक कर रखा था, पर उन्हें भी भागना पड़ा. उनके लिए आसान था क्योंकि वह आमू नदी पर कर अपने देश चले गए. अमेरिका के लिए अफगानिस्तान छोड़ना उतना आसान नहीं होगा. ओबामा के जुलाई २०११ के सपने सच होते नहीं दीखते.
Thursday, November 26, 2009
Stop that likelihood
Prime Minister Manmohan Singh has said, in so many words and many many times, that another attack is likely. The top defence officers keep claiming we are ready but one can't rule out another attack. Can we stop this likely business? What the hell do we have a government for? Do we have an intelligence system or not? Can our leaders tell us that they will not let another 26/11 happen? At least on 26/11.
Friday, November 13, 2009
नेता नियुक्त नहीं किये जाते, नेता हो जाते हैं
Thursday, November 12, 2009
Dawood is more powerful than Sarkozy
American President Barack Obama tops the list, followed by Chinese bossman Hu Jintao and Russian premier Vladimir Putin. World's most wanted terrorist Osama bin Laden comes at no. 37, just below Indian Prime Minister Manmohan Singh who is at 36. Pakistani Prime Minister Yusuf Raza Gilani is at after Osama at 38.
How did terrorists prop up in a list full of CEOs, presidents, prime ministers and even the Dalai Lama? Forbes says they considered four parameters.
"First, do they have influence over lots of other people? Do they control relatively large financial resources compared with their peers? Are they powerful in multiple spheres? There are only 67 slots on our list--one for every 100 million people on the planet--so being powerful in just one area is not enough. Lastly, we insisted that our choices actively use their power."
Considering that Osama is believed to be living in Pakistan's northwest and Dawood in Karachi, Osama is the most powerful person living in Pakistan, more powerful than the Pakistani Prime Minister. The main accused in Mumbai serial bomb blasts case Dawood Ibrahim Kaskar is the third most powerful person living in Pakistan. And by the way Osama and Dawood are not valid Pakistani citizens, they are only sheltered and protected by the ISI.
In other prominent points, Congress chief Sonia Gandhi does not figure in the list because she does not actively uses her power. Hillary Clinton is way above her husband, former President Bill Clinton.
Friday, October 23, 2009
हुआ हिन में लाल कमीज़
Diary item ...
लाल कमीज़
पन्द्रहवें आसियान शिखर सम्मलेन पर लाल कमीज़ का गहरा साया है. थाईलैंड के युनाइटेड फ्रंट फॉर डेमोक्रेसी अगेंस्ट डिक्टेटरशिप को अनाधिकारिक तौर पर रेड शर्ट कहते हैं क्योंकि अपने उग्र प्रदर्शनों के दौरान इसके सदस्य लाल कमीज़ पहनते हैं. ये दल पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन सिनावातरा के बाइज्ज़त थाईलैंड लौटने देने के लिए आन्दोलन कर रहा है. सितम्बर २००६ में सेना ने तख्तापलट कर थाकसिन की सरकार को हटा दिया था और उनपर भ्रष्टाचार के मुक़दमे चलाये गए. थाकसिन को दो साल की कैद की सज़ा सुनाई गई है पर वह देश से बाहर हैं. थाईलैंड के ग्रामीण और पिछडे इलाकों में थाकसिन बहुत लोकप्रिय हैं. उनके समर्थक पार्टियों ने २००७ की आम सभा में बहुमत प्राप्त कर लिया था पर उनमें से मुख्य पार्टी पीपुल्स पॉवर पार्टी को एक संवैधानिक कानून ला कर अवैध घोषित कर दिया गया. तब से उन के समर्थक लाल कमीज़ दाल अक्सर थाईलैंड के शहरों में प्रदर्शन करते हैं.
इस के पहले ये सम्मलेन थाईलैंड के पट्ट्या में होने वाला था पर लाल कमीज़ के धमकियों से उसे निरस्त करना पडा था. अब जब यह हुआ हिन् में हो रहा है, तो इस में लाल कमीज़ वालों ने वादा किया है कि वे सम्मेलन को शांतिपूर्वक चलने देंगे बशर्ते उन्हें अपनी मांगें शीर्ष नेताओं के सामने रखने दिया जाए. थाईलैंड की सेना ने उनकी बात मान ली क्योंकि हुआ हिन् में हंगामे का मतलब होता सम्मेलन का पुनः निरस्त होना.
फिर भी हुआ हिन की सुरक्षा व्यवस्था पुलिस के हाथों में नहीं. बैंकॉक के २०० किमी दक्षिण में स्थित चा आम और हुआ हिन बैंकॉक या पट्टाया की तरह पर्यटन स्थल तो हैं पर तुलनात्मक रूप में उनसे काफी शांत और स्वच्छ. पर आसियान बैठक को देखते हुए सेना ने सुरक्षा व्यवस्था अपने हाथों में ले ली है. आम दिनों की तरह पर्यटकों की चहल पहल कम है. १८,००० सैनिक और नौसेना के कई युद्धपोत चा आम और हुआ हिन में हर आने जाने वालों पर नज़र रख रही है.
भारत चाहता है कि वह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के इस संगठन के साथ बेहतर तालमेल कर इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम कर सकता है पर इसे लगता है सिर्फ भारत और चीन ही इतनी गंभीरता से लेते हैं. सदस्य देशों में कई के शीर्ष नेता सम्मेलन के उदघाटन समारोह से नदारद रहे. इंडोनेशिया, फिलिपिन्स और मलयेशिया के प्रमुखों में किसी ने ख़राब मौसम का हवाला दिया तो किसी ने घरेलू ज़रूरतों का बहाना बनाया. जो आये उनमें दुराव कम होता नहीं दिखता. थाईलैंड और फिलीपींस में चावल के दामों के ऊपर का विवाद नहीं थमा है और दूसरे पडोसी कम्बोडिया से सीमा विवाद जस का तस है. थाईलैंड के प्रधानमंत्री अभिसित विज्जजिवा को चिढाने के लिए कम्बोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने कहा कि पूर्व थाई प्रधानमंत्री थाकसिन सिनावातरा उनके निकट मित्र हैं और वह जब चाहें कम्बोडिया में उनके घर रह सकते हैं. इस पर थी प्रधानमंत्री अभिसित ने कहा कि उन्हें दूसरे दिन ही अपने मित्र को थाईलैंड के कानून के हवाले करना पड़ेगा क्योंकि कम्बोडिया और थाईलैंड के बीच संधि है कि वे एक दूसरे देश के अपराधियों को शरण नहीं देंगे. खैर इस चीख चीख में लाल कमीज़ वालों के बीच हुन सेन हीरो हो गए हैं.
