Sunday, January 29, 2012

बिन डेरे हम तेरे

जो पिए छुपके वो मुनाफिक है, बेतक़ल्लुफ़ शराब पी लीजै, इस शेर पर तालियाँ बजती हैं तो ये शायरी का कमाल है, इससे शराब में कोई अच्छाई नहीं आ जाती. वैसे ही धर्म-अध्यात्म के केन्द्रों पर मत्था टेकने से सवाब मिलता है पर ये उस चौखट का करिश्मा है, इस सिर का नहीं. डेरा सच्चा सौदा पहुँच कर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि मैं यहाँ बेधड़क आता हूँ, अकालियों की तरह छुपकर नहीं. ऐसे खुलने में कौन से गर्व की बात है, छुपने में कौन सी अच्छाई? अब कैप्टन साहब चुनाव प्रचार से वक्त निकाल कर सिरसा अध्यात्म की दीक्षा लेने तो गए नहीं होंगे. बुरी शै है शराब, जिगर को खाती है चाहे छुप के पियो, या खुल के. वैसे ही धर्म गुरुओं के संगत से भला होता है, चाहे छुप के मिलो या खुल के. मालिक से लौ लगाने के बहाने उस लौ पर रोटी नहीं सेंकी जाती. सर उत्ते टोपी, ते नीयत खोटी फिर की लेना सिर धर के.
पंजाब में डेरों का इतिहास पुराना है और ये डेरे समाज में फैली कुरीतियों से लड़ने में अहम किरदार निभाते हैं. अध्यात्म से करीब और दुनियादारी से दूर रहने वाले संतों-महात्माओं को खासी मुसीबत होती होगी जब सियासत के खिलाड़ी उनसे इंतखाबात की बात करते होंगे. डेरा सच्चा सौदा सहित सभी डेरों ने साफ़ तौर पर किसी पार्टी की वकालत नहीं की और अपने मुरीदों के विवेक पर मामला छोड़ दिया. ये उनकी मेहरबानी. पर उससे सियासत के सिपाहियों को कभी सीख नहीं मिलती. वो वोटर के विवेक पर कुछ छोड़ना नहीं चाहते. वोटर के दिल तक का रास्ता बहुत लंबा है, तो वो डेरों का शॉर्टकट लेने का लोभ नहीं छोड़ पाते. अकाली पार्टियां पंथ की सियासत करती रही हैं. शिरोमणि अकाली दल को इस बात की दाद कि उन्होंने इस बार वह लीक छोड़ी और विकास को मुद्दा बनाया. पर उनके भी कई उम्मीदवार भी डेरों से उम्मीद लिए बैठे हैं. वोटर पंथ या संत नहीं देखता, नीति और नीयत देखता है. उस को मालूम है, चंडीगढ़ का रास्ता उसके घर से गुजरता है.
अध्यात्म के सहारे बात नहीं बनती तो मनोरंजन का बहकावा भी है. फ़िल्मी चेहरे मंच पर मोहरे होते हैं, साथ में थोड़ा भंगड़ा होता है, थोड़ी हीर भी. बात में दम नहीं, फिर भी हम किसी से कम नहीं. हेमा मालिनी भाजपा से राज्य सभा की सदस्य हैं, पर उनका उपयोग चुनाव प्रचार में ज्यादा है. आप यह कह सकते हैं कि फ़िल्मी सितारों को भी राजनीति का हक है पर कभी उनकी सभाओं में हो आइए. जनता उनसे शोले के डायलॉग सुनने की फरमाइश करती है, उनसे सियासी गुफ्तगू की उम्मीद नहीं करती. नगमा भी आईं पर बस भीड़ जुटाने. इस बार पंजाब में शक्ति कपूर नहीं आए, वरना अब वे भी इस काम में लाए जाते हैं. ऐसे नेता की क्या विसात जिन्हें सुनने आने के लिए जनता को देखने का इंतज़ाम चाहिए. ये पंजाब की बात नहीं, पूरे मुल्क की है. फ़िल्मी सितारों को सिर्फ इसलिए बुलाना कि लोग आ जाएं.
भला हो चुनाव आयोग का, वरना आइटम गर्ल्स भी नचा देते. इस बात का शुक्रिया तो ज़रूर कही कि चुनाव प्रचार कब थम गया पता ही नहीं चला. नेताओं के खर्चे कम हुए, जनता की परेशानी कम हुई. शोर कम हुआ, जोर भी. लाखों बोतल शराब जब्त हुई. नोट भी. पर जो बच गई, वो बंटेगी आज की रात. आज की रात बहुत कठिन होगी. जागते रहिए.

लोरी सुनो पर जागते रहो* *शर्तें लागू

राजनीतिक पार्टियों को अपने वादों के साथ एक तारा लगाकर 'शर्तें लागू' भी लिखना चाहिए. शर्तें जैसे कि अगर रेवन्यू इकठ्ठा हो पाया तभी ये योजनाएं लागू होंगी.
यूपी में अभी-अभी बीजेपी का घोषणापत्र ज़ारी हुआ है, उसमें मुलायम सिंह के लैपटॉप के बदले लैपटॉप का वादा किया है. इस प्रतियोगिता की शुरुआत तब हुई जब केन्द्र सरकार ने आकाश टैबलेट को कांग्रेसी अचीवमेंट बना कर दिखाना शुरू कर दिया. जिस मुल्क के कई खित्ते अभी स्कूल का मुंह नहीं देख पाए हैं, उस मुल्क में १,००० रूपए का टैबलेट एक गोली नहीं तो क्या है. आईआईटी जोधपुर, जिसने आकाश प्रोजेक्ट का बीज बोया था, उसने भी आकाश को फेल करार दिया है. कम्प्यूटर के शोर में असली मुद्दों की आह सुनाई नहीं दे रही, पर चुनाव के बाद उनका सामना तो करना ही पड़ेगा.
यूपी को पहले स्कूल चाहिए, ६५ फ़ीसदी बच्चे स्कूल से बहुत दूर हैं, जहाँ स्कूल है वहाँ लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट चाहिए, क्योंकि अक्सर ऎसी दिखने-में-छोटी ज़रूरतों के चलते लड़कियों की पढ़ाई रुक जाती है. ऐसे हजारों स्कूल हैं जहाँ छत नहीं, छत है तो टीचर नहीं. टीचर है तो वे अपनी सैलेरी के लिए हड़ताल पर हैं. सरकार उनसे कहती है पैसे पेड़ पर तो उगते नहीं, कहाँ से दें. पैसे किसान उगाते हैं पर उनको उतने पैसे नहीं मिलते जितने का पसीना खेत सोंख जाता है. मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ नहीं सकती क्योंकि सरकार कहती है पैसे पेड़ पर नहीं उगते. अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो दवा नहीं, दवा है तो नकली है, असली है तो उसमें एनएचआरएम घोटाला है. फिर भी यूपी जैसे गरीब राज्य में पार्टियां लैपटॉप बांटने को आतुर है. भले ही राज्य कर्जे पर ब्याज का भुगतान करने के हालात में नहीं. क्योंकि चुनाव के वक्त हम वादों की चकाचौंध में बहुत कुछ देख नहीं पाते और आरोप-प्रत्यारोप के शोर में कुछ सुनाई नहीं पड़ता.
अपने पंजाब के हालात देखिए. कांग्रेस शिरोमणि अकाली दल पर आरोप लगाती है कि राज्य पर ७८००० करोड़ का क़र्ज़ हो गया है, मानो ये क़र्ज़ सिर्फ एक सरकार ने लिया हो. १९९७ में कांग्रेस सरकार गई तो पंजाब पर क़र्ज़ था १२,००० करोड़, जब २००२ में अकाली गए तो वह दुगुना हो गया यानि २४,००० करोड़, फिर जब आई कांग्रेस आई तो ये कम नहीं हुआ, बल्कि 2007 में जाते जाते क़र्ज़ दुगुना हो गया यानि ४८,००० करोड़. क़र्ज़ का घी पीना राजनीतिक परंपरा है.
बैंक क़र्ज़ देने से हाथ खड़े कर रहे हैं. वह भी भारत के सबसे खुशहाल राज्य को. क्योंकि आर्थिक नीतियां पंजाब-केंद्रित नहीं हैं, वोट-केंद्रित हैं. जिस राज्य के विकास दर से अन्य राज्य सीख लेते थे, उसका विकास दर ६ प्रतिशत से नीचे है. पड़ोस के हरियाणा का ११ प्रतिशत है. हिमाचल जैसे दुर्गम राज्य का ९.५ फ़ीसदी है और झारखण्ड जैसे भ्रष्ट-त्रस्त राज्य का ९.८ फ़ीसदी है. मुफ्त की बिजली ने पंजाब बिजली निगम की कमर तोड़ दी है जिसे किश्तों के भुगतान होने का टोटा है. ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं. ये एक बुरा सपना है जिस से जागना ज़रूरी है. राज्य को जगाने की ज़िम्मेदारी जिनकी है वह जनता को लोकलुभावन लोरी सुना कर सुला देना चाहते हैं. बस आप जागते रहिए. वोट उन मुद्दों पर दीजिए जो असली मुद्दे हैं. वोट बिजली पैदा करने के लिए दीजिए, मुफ्त की बिजली के लिए नहीं. वोट रोज़गार पैदा करने वाली नीतियों के आधार पर कीजिए, सरकारी रोजगार योजनाओं या नौकरी के नाम पर नहीं. वोट महंगाई कम करने वाली नीतियों पर दीजिए, मुफ्त के राशन पर नहीं. निचले स्तर पर भ्रष्टाचार खत्म करने के उपायों को देखिए, ना कि वादों को. सरकार जिनकी भी बने उनको राज्य की प्राथमिकताएं सुशासन के चश्मे से देखनी पड़ेगी, क्योंकि पंजाब को तेज आर्थिक विकास की पटरी पर वापस आना है. आप उसे चुनिए जो यह कर सके. सही को चुनिए.

Thursday, October 14, 2010

See you @ Wordpress

Hi, this blog is now available on Wordpress site Kam Sutra. See you there.

Wednesday, August 11, 2010

Superbug and super-prejudice


पश्चिम का पूर्वाग्रह और एक जीवाणु  
मेडिकल रिसर्च की पत्रिका लैंसेट ने संक्रामक रोगों पर अपने हालिया विशेषांक में चेतावनी दी है कि एक ऐसा जीवाणु जिसे सुपरबग नाम दिया गया है, ब्रिटेन और अमेरिका में तेज़ी से फैल सकता है. इस सुपरबग या यूं कहें महाजीवाणु पर किसी एंटी-बायोटिक का असर नहीं होता. यानि इस से संक्रमित रोगी का इलाज बेहद मुश्किल हो सकता है. इस नई शोध की खबर से चिंता की लकीरें भारत में भी फैलेंगी क्योंकि शोध के अनुसार ये जीवाणु भारत से ही दूसरे देशों में गए हैं.शोधकर्ताओं का कहना है कि सस्ते इलाज के लिए पश्चिमी देशों के कई लोग भारत या पाकिस्तान जैसे देशों में जाकर इलाज करवाते हैं, जहाँ से वह ये सुपरबग लेकर घर लौट रहे हैं और पश्चिमी देशों में फैला रहे हैं. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में भारत के दो डॉक्टरों ने यह कहा कि भारत में चूँकि ड्रग नियंत्रण कमज़ोर है ओर एंटी-बायोटिक्स का दुरूपयोग स्व-चिकिस्ता में करते हैं तो ऐसा तो होना ही था. मतलब ये कि हमने भी इस रिपोर्ट को हाथों हाथ लिया है.
भारत को इसे आड़े हाथों लेना चाहिए. हमें इस शोध की शोध करना चाहिए और इसका सत्यापन करने के बाद ही सहयोग करना चाहिए. इसमें कोई बुराई नहीं कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियों और उपमहाद्वीप के जीवाणुओं पर पूरी दुनिया रिसर्च करे. पर इस रिपोर्ट की इमानदारी पर शक होना भी अस्वाभाविक नहीं होगा. भारत में मेडिकल टूरिजम को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने नीतियां निर्धारित की हैं. हमारे डॉक्टर दुनिया के शीर्ष डॉक्टरों में आते हैं और हमारी मेडिकल शिक्षा को भी सम्मान की नज़र से देखा जाता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पश्चिम के लोगों को भारत में इलाज करवाने से हतोत्साहित किया जा रहा हो? पश्चिम की मेडिकल लॉबी इस पर बहुत वक्त से काम कर रही है. लैंसेट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान पर ऊंगली उठाए बिना भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को इस विषय पर हमारे विशेषज्ञों से राय लेनी चाहिए. कहीं यह हमारे बढ़ते मेडिकल पर्यटन पर चोट पहुँचाने की कोशिश तो नहीं. क्योंकि ये सुपरबग का पूरा मामला पहली नज़र में पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है.
यह बैक्टेरिया एक ऐसा एंजाइम पैदा करता है जो एक बिलकुल नया जीन है. यह एक जीवाणु की दवाओं से लड़ने की शक्ति बढ़ाता है. इस एंजाइम का नाम है एनडीएम-१. अब ज़रा इसके फुल फॉर्म पर नज़र डालिए. इसका पूरा नाम है न्यू डेल्ही मेटालो बीटा लैक्टमेस-१. जब भी इस जीवाणु की खोज हुई इसका नाम भारत की राजधानी पर क्यों रखा गया? अगर हम यह मान भी लें कि इसके रोगी भारत, पाकिस्तान या बंगलादेश होकर आए थे, तो भी एक जीवाणु का नाम नई दिल्ली के नाम पर क्यों? क्या कोई मेडिकल टर्म नहीं मिला? क्या इसे साउथ एशियन नहीं कहा जा सकता था? इसके नाम से ही पश्चिम के पूर्वाग्रह की बू आती है. और इसीलिए लैंसेट के इस रिपोर्ट को हमें हाथों हाथ नहीं, आड़े हाथों लेना चाहिए.        
ब्लैकबेरी या ब्लाकबेरी?
कनाडा की ब्लैकबेरी भारत समेत पूरी दुनिया के टॉप कॉर्पोरेट अधिकारियों के लिए कीमती गहने जैसा है. उसके बिना वह दिखें तो अपने आप को अधूरा महसूस करते हैं. ब्लैकबेरी मीन्स बिज़नेस. उसी ब्लैकबेरी पर काले बादल छाए हुए हैं. भारत सरकार का कहना है कि अगर ब्लैकबेरी सुरक्षा एजेंसियों को अपने सर्वर को छानने की छूट नहीं देता तो उसकी सेवाओं पर प्रतिबन्ध लग सकता है. ब्लैकबेरी अपने इमेल और इंस्टेंट मेसेजिंग के लिए जानी जाती है, जो सेवा अब हर दूसरे फोन में उपलब्ध है. पर ब्लैकबेरी में एक फर्क है. रिसर्च इन मोशन नाम की कनेडियन कंपनी द्वारा बनाए जाने वाले इस फोन में ईमेल का भेजना या रिसीव करना ब्लैकबेरी सर्वर से होकर है. जो कनाडा में है. फोन से इंस्टंट मैसेज या इमेल जब निकलता है तो वह कोडेड होता है और उसका इनक्रिप्शन बहुत उच्च कोटि का है. वह बीच में कहीं इंटरसेप्ट हो भी जाए तो उसे डिकोड करना मुश्किल है. भारत सरकार का कहना है कि आतंकवादी इसका उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में कर सकते हैं. रिसर्च इन मोशन का कहना है वह डिकोड करने की इजाजत नहीं दे सकता, क्योंकि इस से उसके कॉर्पोरेट उपभोक्ताओं कि प्रायवेसी भंग होती है.
पर उसका ये उपभोक्ता प्रेम सिर्फ भारत के मामले में ही क्यों जागता है, यह ब्लैकबेरी के अफसरान नहीं बता रहे. अमेरिका को एक्सेस देने में उन्हें यह याद नहीं आया, चीन ने कान मरोड़ी तो तुरंत सर्वर चीन में लगा दिया, सउदी अरब को भी इंस्टंट मैसेज को डिकोड करने की सुविधा दे दी. अपने देश कनाडा में तो ये सुविधाएं सरकार को दे ही दीं. भारत कोई बनाना रिपब्लिक तो है नहीं जो अपने सारी कॉर्पोरेट कंपनियों के हर ईमेल को छाने. हम एक लोकतान्त्रिक देश हैं और हमारे यहाँ व्यवसाय करने के लिए हमारे कानूनों की परिधि में काम करना होगा. जब आईफोन, एंड्रोइड और सिम्बियन जैसे लोकप्रिय प्लेटफोर्म पर फोन बनाने वाली कंपनियों ने सुरक्षा के मुद्दों पर भारत के कानून के दायरे में काम करना स्वीकार किया है तो ब्लैकबेरी क्यों नहीं? वैसे भी यहाँ की कंपनियों के सारे इमेल ब्लैकबेरी से ही नहीं चलते, सबके अपने सर्वर हैं. भारत के साथ अकड़ और अमेरिका के साथ लचर, ये कौन सी प्रायवेसी है?

राव के सर ठीकरा
जब भोपाल गैस कांड हुआ था तब अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री थे और नरसिम्हा राव गृह मंत्री. तब यूनियन कार्बाइड के मुखिया और कांड के मुख्य अभियुक्त एंडरसन को भारत से सहर्ष विदाई देने में अर्जुन सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई थी. बीस हज़ार लोगों की जान गई और आज भी एंडरसन अमेरिका में खुले आम घूम रहा है. बहरहाल जब न्याय आया तो देश में अन्याय की चीख उठी. अर्जुन सिंह नहीं बोले. कल बोले तो उन्होंने सारा दोष राव पर मढ़ा. राजीव और राव दोनों इस दुनिया में नहीं हैं, उनके आरोपों का जवाब देने के लिए. अर्जुन सिंह ने राव को चुना क्योंकि राव का परिवार उनको और उनके परिवार को राजनीतिक नुकसान पहुँचाने की स्थिति में नहीं है. राजीव गाँधी का नाम लेते तो कोई अर्जुन का नामलेवा नहीं रहता.    

बड़े बेआबरू
कलमाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले में गले तक धंसे हैं पर अभी भी तने बैठे हैं. उनके सिपहसालार टी.एस. दरबारी बर्खास्त हो चुके हैं और अब जो कुछ खुलासे कर रहे हैं उस से कलमाडी की जान सांसत में है. दोस्त दोस्त ना रहा... ये गाना राग दरबारी में नहीं है पर कलमाड़ी को तो ऐसा ही लग रहा होगा. और कलमाडी की राग जयजयवंती अब ज्यादा देर तक कोई सुनेगा नहीं. इस कूचे से निकालना तो है ही, पर उन्होंने ठान राखी है कि बेआबरू हो कर ही निकलेंगे.

Tuesday, May 25, 2010

खाप का पाप: Sins of the Khap and uber-urban modesty ablaze

Khap is a dreadful word. And not without its frightening reasons. These panchayats of of village clusters in Haryana, Western UP and parts of Rajasthan are notorious for their dictats. They go so far as to sentence people to death or excommunicate families, auction their lands or better take over their property. Their victims, the accused to them, seldom defy for the fear of losing their dear life. Recently, five people were sentenced to death by the law for killing a couple on the orders of the khap. The couple, Manoj and Babli, had married in spite of being from the same gotra. The Khap panchayats decided to fight for the murderers. Cornered, they also asked their MPs and MLAs to push for a law that bans intra-gotra marriage in a last-ditch effort to add some legitimacy to their stance against such unions. 

And the Metropolitan India was furious. TV anchors and convent-educated uber-urban Indians have launched a tirade against khap panchayats and question their legitimacy. Khap panchayats have no legitimacy, so their is no question of anything legal about them. In their war on Khaps, they started questioning the custom of inter-gotra marriages. Without understanding what gotra actually means and what it means to the society in north India in general, they have been throwing talk-show explosives at Navin Jindal, an industrialist and member of Parliament from Kurukshetra. His fault was that he attended a khap meeting where villagers asked him to submit their memorandum to the government. The memorandum sought a law barring same-gotra marriage in their community.


Now the so-called educated folks in Delhi are outraged. How can an educated, young MP like Jindal do it? Jindal says he is their representative and all he did was give them a hearing. But now they are asking him whether he too believes that people from the same gotra should not wed. He lies and says no he doesn't believe in such archaic things. He lies because 99.3 per cent of Haryanvis looking for life-partners on the internet believe in it. Imagine the uneducated, non-internet users. 
People simply do not believe in intra-gotra marriage because for centuries they have been told that people from your own gotra are your cousins and in some societies marrying your cousin is not kosher. They are told that you belong to the same blood line, hence  go get married elsewhere. Which in a way is good because it promotes inter-caste marriage, which is much desirable in a caste-ridden society like theirs.

Now the question comes what if two people fall in love and are from the same gotra? Well, then they should decide. The khaps can go to hell. But on the ground, such cases are few and far between. People from same gotra in these trouble torn areas don't fall in love with each other. Like people don't fall in love with their cousins in Delhi, they don't fall in love with their cousins in Jind. Even in Delhi, in an exceptional case, a boy falls in love with a girl without knowing she is his cousin, it's their business until their families find each other out and the fathers recognise each other. They will oppose no matter how educated they are. That's what is happening in Jind, except at a very rustic level. And in some cases, surfaces in a criminally violent way.

The khaps take it to a ridiculous extent and bar marriage within a village even if its inter-khap and not intra-khap. And when they behave like law unto themselves. That's the time for the law, the constitution to arrive and make them feel the presence of their rule. That's what happened when the murderers of Manoj and Babli got death. That is what will teach the khaps a lesson. But what urban India needs a lesson in is age-old customs and cultural nuances of our society and how to deal with them. You can't rubbish it all because it sounds unscientific to you. God is unscientific so is the multiplicity of faiths and beliefs. And before you say beliefs can't decide people's personal lives when we are all ruled by law, be reminded that we have chosen to have personal laws. There is a marriage act for Hindus which differs for different regions. There is personal law for Muslims and there will soon be a personal law for Sikhs. We have no uniform law governing our personal choices because we believe in diversity.

So for sake of diversity, accept diverse cultures. These village people are your own and as Indian as the rest of us. They have some customs and beliefs and they want the rest of India to respect that. Don't believe in what they say but allow them to say what they believe in. If in the name of that belief, they kill and maim, the criminal law should take care of that. Because criminal law is uniform for all. Punish those who kill their daughters in the name of honour. But in your blind homogenised world view, don't laugh at people's way of life. If you really dream of a modern India with people with all modern beliefs, mouthing the same language, boasting about same values and heartily accepting intra-gotra marriages, go back to sleep. If you wake up, be brave enough to see many different Indias in this one India.  

Friday, April 23, 2010

हसीना का पसीना और पॉकेटमारों की चाल

हमारे देश के मेले मजमों में, बड़े शहरों के बस स्टैंड या रेलवे स्टेशनों पर उचक्के-उठाईगीर गैंग बना कर काम करते हैं और अगर कोई पकड़ा जाए तो उसको छुड़ाने का भी उनका अपना देसी तरीका होता है. अगर किसी की जेब तराशते कोई धरा गया और गैरमजरुआ धुनाई की संभावनाएं प्रबल हो गईं तो उसके साथी उसको बचाने के लिए उसी पर पिल पड़ते हैं. उसे तमाचे रसीद करते हैं और कान पकड़ कर ये कहते खींचते चलते हैं कि चलो पुलिस थाने में तेरी मरम्मत करवाता हूँ. उसके शिकार और पब्लिक धुनाई में भागीदार हाथ मलते खुश होते हैं कि चोर पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उनको भनक तक नहीं लगती कि मौसेरे भाई उसे बचा ले गए. कुछ माँ बाप भी ऐसा करते देखे जाते हैं अगर लाडला किसी गैर घर का शीशा तोड़ते पकड़ा जाए. वे हलके हाथों से अपने बच्चे को खुद मारना पसंद करते हैं ताकि पड़ोसी की बुरी नज़र और निर्मम हाथ उस पर ना पड़ें.

क्रिकेट के अभिभावक अपने लाडले ललित पर ऐसे पिल पड़े हैं मानो सारा गुनाह एक मोदी का है. तीन साल से उसके चेहरे, कपड़ों और हाथों से शीरा रिस रहा था पर उसके माई-बाप और मौसेरे भाइयों को मानो भनक ही नहीं थी कि मालपुए की हांडी के गपतगोल होने में उसका हाथ है. वह ना सिर्फ खुद भकोस रहा था बल्कि उसने अपने सखी-सहेलियों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन कर रखा था. जब सरकार के डंडा का जागरण हुआ तो बीसीसीआई का लालित्य देखिये, सारा ठीकरा आइपीएल पर फोड़ रहे हैं. आईपीएल कोई स्वयम्भू चमत्कार नहीं, बीसीसीआई की संतान है. उसमें किस किस का कितना माल कहाँ से लगा है, सब का हिसाब भी बीसीसीआई को मालूम रहा है. बीसीसीआई कहती है कि वह बिना ललित मोदी की मर्ज़ी के उनको निकाल फ़ेंक सकती है. ये गुस्सा फर्जी है क्योंकि अपनी खुदगर्जी के लिए किसी की मनमर्जी तीन साल चलने दी और जब सांच की आंच आई तो लौ मोदी की और कर दी.
इंडिया सीमेंट के मालिक एन. श्रीनिवासन बीसीसीआई के बड़े अधिकारी हैं और उनकी एक टीम भी है. क्या यहाँ टकराव नहीं? राजस्थान रॉयल्स की टीम के सारे एनआरआई हैं यह तो सबको मालूम था, पर क्या चेलाराम की पहचान बीसीसीआई के गुरु-घंटालों से छुपी थी? किंग्स इलेवन में मोदी के दामाद ऊंगली क्रिकेट खेल रहे थे, यह भी सब को पता था. फर्क इतना था जनता क्रिकेट में मस्त थी, सुस्त सरकार खुद में व्यस्त थी. थरूर अगर नौसिखिए नहीं होते तो क्रिकेट के भ्रष्टाचार की इतनी बड़ी सीख से सभी महरूम रह जाते. प्रफुल पटेल कहते हैं कि वह अपने मंत्रिमंडल सहयोगी शशि थरूर को एक टीम दिलवाने में मदद कर रहे थे. जो ईमेल पटेल की ऑफिस से थरूर को गया उसमें ऐसे आंकड़े थे कि थरूर डर जाएँ क्योंकि उसमें अगले दस साल तक करोड़ों के घाटे का सौदा दर्शाया गया था. वह थरूर की मदद कर रहे थे या उन्हें भय से भगा कर बेटी पूर्णा के मित्र ललित मोदी की मदद कर रहे थे. अगर टीम लेना इतना घाटे का सौदा है तो फिर डेढ़ हज़ार करोड़ कुर्बान करने वाले सुब्रत राय सहारा सौ फ़ीसदी सौदाई हैं. घाटे के सौदे के लिए बोली लगाई जाती है, ये तो हमें मालूम ही नहीं होता. सरकारी एजेंसियां तो तीन साल से हाथ पर हाथ धरे बैठी थीं.
भला हो उस ट्विट्टर का जिसकी चूँ-चूँ से क्रिकेट के मैदान से लेकर लोक सभा तक थू थू हो रही है. अगर शशि थरूर सुनंदा को पुश कर पाते और ललित मोदी थरूर को खुश कर पाते तो आज थरूर अपनी सीट पर होते और मोदी अपनी पुरानी हीट पर. सुनंदा की स्वेट इक्विटी अर्थात हसीना का पसीना सत्तर करोड़ का क्यों है, ये ट्वीट नहीं होता तो सब स्वीट होता. आज सबके चेहरे पर स्वेट है, और इक्वीटी इन्वेस्टिगेट हो रही है. एक ट्वीट ने खेल ही बदल डाला, खेल खेल के पन्ने पर रहा और खेल के पीछे का खेल फ्रंट पेज न्यूज़ बन गया.
वरना आज अखबार में आईपीएल होता पर बात देश के दो हीरे सचिन और धोनी के भिडंत के बारे में होती, ना इस की चिंता कि क्रिकेट के कोयले की खान में कौन काला होने से बचेगा. तीन साल में पहली बार इंडियन प्रीमियर लीग की ट्राफी किसी इंडियन के हाथ में होगी, यही सोच कर हम फूले नहीं समा रहे होते. पहली बार वार्न ने उठाया, दूसरी बार गिली ने, इस बार सचिन या धोनी, किसी के हाथ हो, ये जीत स्पेशल होना तय थी. पर हुआ क्या? एक नूराकुश्ती जिसकी दो पार्टियां हैं: बीसीसीआई और बीसीसीआई. बीसीसीआई क्रिकेट पर कंट्रोल करती है पर उस पर कंट्रोल कुछ गिने चुने मठाधीशों का है. बीसीसीआई कहेगी उसका एक लोकतान्त्रिक संविधान है. उस लोकतान्त्रिक संविधान की पोल खोलनी हो तो ललित मोदी के बीसीसीआई में एंट्री की कहानी खोल लीजिए. तब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने आईएएस अफसर संजय दीक्षित को मोदी को नागौर के रास्ते राजस्थान क्रिकेट का अध्यक्ष बनवा दिया. फिर राजे के राज में राजस्थान क्रिकेट और उसके बाहर मोदी ने वह गुल खिलाए कि हरी भरी वसुंधरा की राजनीतिक ज़मीन मरूभूमि में तब्दील हो गई. राजे गईं, राज गया पर मोदी तब तक अपना काज निकाल चुके थे.
बस स्टैंड के उचक्कों वाली मिसाल से यहाँ मामला थोड़ा हट के है. यहाँ पुलिस भी दौड़ चुकी है. अब सवाल है कि क्या पुलिस सिर्फ उचक्के को अंदर करती है या उसे खींच कर लाने वाले को भी... पब्लिक को अब यह खेल मालूम है. मौसेरे भाइयों की भिड़ंत जिसमें बीसीसीआई यह दिखलाना चाहती है कि वह ललित मोदी को कड़ी से कड़ी सज़ा देगी. मोदी का कान पकड़ कर खींचते कह रही है चलो मैं तेरी मरम्मत करवाती हूँ पुलिस से. पुलिस यानि केन्द्र सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह मोदी की नहीं बल्कि इस पूरे गैंग की मरम्मत करे. वरना जेबें कटती रहेंगी. उठाईगीरों की कमी नहीं इस मुल्क में.

Thursday, February 04, 2010

Tigers do, dogs do ... Mumbai micturated

Uddhav Thackeray says Shah Rukh Khan must retract his statement or it will have consequences. Shah Rukh Khan says there is nothing that he said which he can retract. Shah Rukh has not called Thackerays slappy headed sugar tits yet so what exactly should he apologise for. Shiv Sena's Saamna newspaper misuses the right to expression by calling people names, yet believes Shah Rukh doesn't have the same right to speak his mind. While all this goes on, governments at both the Centre and the state wait and watch and at best seek legal counsel.

Uddhav Thackeray says Rahul Gandhi must retract his statement about Mumbai belonging to all Indians, else he would not be allowed into Mumbai in future, clearly marking his territory.
In jungles, tigers are known to mark their territory by leaving their smell by excreting or . In , dogs can be seen lifting a hind leg against walls, car tyres and electic poles to do the same. Laws of the jungle, you know! Thackerays do not go out of Mumbai, not even to parts of Maharashtra. They remain inside their Dadar stronghold and bark at folks living in Bandra. They beat up Biharis and UP wallas. I hardly remember Bal Thackeray travelling to any other part of India. If my memory serves me right, he has visited Delhi only once in past many years. And we are told the world is small place. That we live in a freaking global village. In a country where boundaries have disappeared because of needs of economy and better means of travel, a family is redrawing boundaries. And we need their permission!

The Congress in its zeal to see the Sena divided allows both the young Thackerays to fight and prove who can do maximum damage to Maximum City. It's a turf war between two cousins that may cost India its founding principles. The basic idea of India is that people who speak different languages can live together in harmony. That unity in diversity is under attack by two cousins and we can do nothing about it. It's not Congress's shame. It must ashame all of us.
That a bunch of hoodlums can slur Shah Rukh Khan because he, a Muslim, dared inviting Pakistani players is a national shame. That a political party with an increasingly minor following can bar citizens from other parts of the country from seeking in employment in Mumbai must reflect upon all of us. That a family decides which feature film can be shown in theatres has been a burden that we all must bear.

We keep blasting Australia for racist attacks on Indians Down Under. We have no blasted ability to stop the same right here, on our soil. The attacks are not on Shah Rukh Khan or so-called north Indians. It's an attack on India and is potentially far more dangerous that the non-state actors from Pakistan inflict upon us. Pakistani terrorists kill Indians, Thackerays try to kill India, the very idea of India.

Wednesday, February 03, 2010

तालिबान से सौदा उलटा पड़ेगा




अफगानिस्तान में खूनी संघर्ष से निकलने की ख्वाहिश बराक ओबामा पर हावी होती जा रही है. उन्होंने वहां से अमेरिकी फौज वापस बुलाने की तारीख भी तय कर दी है पर युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ. तालिबान और ओसामा बिन लादेन का अल काईदा नेटवर्क अभी भी ज़िंदा और खतरनाक हैं. पर अपनी जनता को किये गए वादे के चक्कर में अमेरिका अफगानिस्तान की जनता की फ़िक्र छोड़ रहा है. पिछले हफ्ते लन्दन में हुए अफगानिस्तान कांफेरेंस में यह स्पष्ट हो गया कि तथाकथित भले तालिबान से बातचीत शुरू की जायेगी और शांति नहीं तो समझौते का भ्रम पैदा कर अमेरिका और ब्रिटेन अफगान पचड़े से हाथ खींच लेंगे. अफगानिस्तान का भारत के हितों से सीधा राब्ता है और अब भारत पर दबाव है कि उन हितों की अनदेखी कर वह पश्चिमी ताकतों के साथ हो ले. दबाव किस कदर होगा इस का अंदाजा इस बात से हो जाता है कि विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से यह उगलवा लिया गया कि भारत "भले" तालिबान से बातचीत के पक्ष में है. उस भले तालिबान का चरित्र कैसा होगा इस का अंदाजा उसमें शामिल मुल्ला मुत्तवकील भी हैं जिन्होंने कंधार विमान अपहरण कांड में भूमिका निभाई थी. तब तालिबान-शासित अफगानिस्तान में मंत्री थे और ऊपरी तौर पर भारत और अपहरणकर्ताओं के बीच मध्यस्थता कर रहे थे. पर सारे राज़ खुले तो पता चला वह और उनका पूरा तालिबानी तंत्र आतंकियों से मिला हुआ था. उस तालिबान से बात करने का मतलब यह है कि उन्हें काबुल की सत्ता में साझेदारी देना, जो भारत के हित में कतई नहीं है. दूसरी बात तालिबान के बहाने पाकिस्तान और आईएसआई फिर से काबुल पर अपना नियंत्रण बना लेंगे ताकि सारी ऊर्जा भारत को रक्तरंजित करने में लगाई जा सके. यह जग जाहिर है कि अफगानिस्तान की ज़्यादातर जनता भारत को अपना मित्र मानती है और पाकिस्तान को अफगानिस्तान की आतंरिक मामलों में दखल देने वाला पड़ोसी.
अमेरिका की योजना में तथाकथित "भले" तालिबान को पैसे दे कर अपनी तरफ करना भी है. यह सौदा अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के उन शहीदों का अपमान है जिन्होंने तालिबान से लड़ने में अपने प्राण त्याग दिए. यह उन हज़ारों अफगान नागरिकों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने तालिबान के खिलाफ जंग में अपना सब कुछ गँवा दिया. यह भारत की पीठ में भी छुरा है जिसने अफगानिस्तान में आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में अपने नागरिकों की बलि दी और करोड़ों डॉलर खर्च किये. पाकिस्तान ने इस युद्ध में पैसा कमाया है और वह इस का अंत काबुल में इस्लामाबाद का एक पिट्ठू बिठाना चाहता है. ओबामा ने जो पासा फेंका है वह अमेरिका के लिए उलटा पड़े ना पड़े भारत के लिए उलटा ही पडेगा. भारत को तालिबान से बातचीत या सौदा कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए और अमेरिका को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि वह अपने स्वार्थों के लिए भारत के हितों को दरकिनार नहीं कर सकता. सत्ता में साझेदारी तालिबान को और मजबूत करेगी, जो ना अमेरिका के हित में है ना भारत के. यह अल काईदा और पाकिस्तानी आईएसआई के हित में है. 

Monday, February 01, 2010

आज तक कोई भी रहा ही नहीं

On the Day, A.R. Rahman shared another award for Jai Ho with Gulzar, there is a controversy raging in India whether Gulzar lifted a popular Ishqiya song from a poem written by Sarveshwar Dayal Saxena. Saxena had written a poem for kids “Ibn-e-batuta, pahan ke juuta, nikal pade tuufan mein” and Gulzar wrote a song in Ishqiya as an obvious tribute to Saxena and gave his own twist to it “Ibn-e-batuta, bagal mein juuta, pahne to kartaa hai churrr”. Sarveshwar Dayal Saxena is not alive to see this day when half-wits with little knowledge of his work or Gulzar’s for that matter were dragging both of them in a controversy that is not. My own little survey of 10 people by showing them both these poems/songs threw a scary result. 9 out of 10 said it was plagiarism because the “meaningless” word Ibne batuta had been invented by Saxena and hence Gulzar should have invented his own to rhyme with juuta. These nine did not know that Ibn-e-Batuta was a living creature who walked this earth. But that’s sad, and not so infuriating as calling Gulzar a thief. If that’s how we are going to decide, then Faiz, Insha, Kaifi or Faraz all of them can be accused of committing theft.

If we accuse Gulzar of plagiarism for “Ibn-e-Batuta” then he is never been original. The hugely popular Kar thaiya thaiya is by Bulle Shah. The opening lines of “Dil dhoondhta hai phir wahi fursat ke raat din” is lifted in its entirety from a ghazal by Ghalib titled “Muddat huii hai yaar ko mehmaan kiye hue”. Yet I would recognize it as a Gulzar song and it will remain a Gulzar song. Because he has written it. Period. In fact, Ghalib’s kaafiyaa has been used by poets from Faiz to Gulzar as they weave their own words around the great man’s words to create poetry that resonates with original thought and déjà vu. This is a tradition in Hindustani poetry that goes back to the origins of Hindustani poetry.
And most readers understand the obvious yet subtle tributes. They are never called a tribute to X or Y. I am reminded of many films where great filmmakers pay tributes to past masters or people they admired by designing a scene around a memorable scene from the past. They don’t subtitle it as this scene is a tribute to X. They expect the viewer to understand and rejoice in it.
No one went to Gulzar and asked him before throwing dirt at him. He would have told them of tens of his own work lifted from popular folk or poetry of the great masters. That’s one of the problems with journalism today, an industry I am part of. But it goes beyond this. Ahmed Faraz wrote a heart-breaking nazm about sectarian violence in Pakistan titled Ae mere Logo. Now, we had a patriotic song called Ae mere watan ke logo, immortalized by Lata. Should Faraz credit the songwriter because three words are common? Both these works are entirely different in their treatment and purpose. My answer is no. In Ibn-e-batuta case, it’s so obviously a tribute to Saxena’s poem for kids. By that logic, Jai Ho is too similar to Jai he by Ravindranath Tagore. And the Lage Raho Munnabhai song "Bande mein tha dum" should be attributed to Bankim Chandra Chatterjee for the words Vande Mataram. And "Chal Akela Chal Akela" by Mukesh was a Tagore song.

Pity, Gulzar writes for films where too many thieves masquerade as originals. It is easier to cast aspersions on Bollywood because there are too many phonies inhabiting that world. Gulzar is a misfit and his white kurta is tainted because of this association. Piyush Mishra played around the Jinhein naaz hai Hind par wo kahan hain in Gulaal to perfection. It was an original. But then with people in mood to attack Gulzar for Ibn-e-Batuta, he should hide.

Gulzar ko to bakhsh do

हमारे संगीत का सितारा ए.आर. रहमान ने अपनी धुन में रहने वाले पश्चिम के आकाश पर शान से चमक रहा है. ऑस्कर के बाद ग्रैमी अवार्ड भी उन्होंने हथियाया. स्लमडॉग मिलियनेयर के जय हो के लिए जो ग्रैमी उन्हें आज मिला उसमें स्पैनिश शब्दों के लिए तन्वी शाह और हिन्दुस्तानी शब्दों के लिए गुलज़ार का भी नाम आया. किसी विडम्बना है कि देश में गुलज़ार पर कविता चोरी करने के आरोप लग रहे हैं. उस से बड़ी विडम्बना यह कि हम अपने देश के इस काल के एक नामवर कवि की साख पर बेवजह बट्टा लगा रहे हैं. सोमवार को अखबारों और टीवी चैनलों पर गुलज़ार पर अभद्र टिप्पणियाँ की गईं और उन पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता चुराने का आरोप लगाया गया. ये अनावश्यक विवाद फिल्म इश्किया के लिए गुलज़ार के गाने "इब्ने बतूता" को लेकर है जिसमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता से उठाये दो शब्द "इब्ने बतूता" और "जूता" तुक में आते हैं. इतना होना था कि इलाहाबाद में प्रेस कांफेरेंस हो गया और कई लेखों में गुलज़ार की रचनाशीलता पर प्रश्न उठा दिए गए. प्रेरित रचना और रचना सृजन के बीच एक बेहद पतली लकीर होती है. यह संभव है और यहाँ तक कि हो सकता है कि गुलज़ार ने यह गाना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचना से प्रेरित हो कर लिखा है पर उन्होंने उस लकीर को लांघा नहीं. दोनों कृतियों में यही फर्क है. पर आधी जानकारी और कविता सृजन की आधी समझ वाले टिप्पणीकारों ने गुलज़ार पर हमला सा बोल दिया है कि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को क्रेडिट क्यों नहीं दी गई. कीचड़ उछालने से पहले कम से कम गुलज़ार से एक बार पूछ लेते, उन्हें सर्वेश्वर दयाल की कविता से प्रेरित होने की बात स्वीकारने से गुरेज़ नहीं होती.
अगर ऐसा है तो फिर चल छैयां-छैयां के लिए बुल्ले शाह के साथ क्रेडिट बांटने की आवाज़ क्यों नहीं उठी या फिर दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन जिसका मुखडा ग़ालिब के मुद्दत हुई है यार को मेहमान किये हुए ग़ज़ल का एक शेर है. यह बात गुलज़ार ने छुपाई नहीं पर हिन्दुस्तानी रचनाओं में ग़ालिब के शब्दों में "अगले ज़माने के" कृतियों को आगे ले जाने की परम्परा है. उस हिसाब से "जय हो" शब्द हमारे लोक काव्यों से लेकर कई साहित्यिक रचनाओं में इस्तेमाल हुआ है, फिर गुलज़ार किस के साथ इस का ऑस्कर बांटें. कुंवर महेंद्र सिंह बेदी का उर्दू गज़ल की दुनिया में अपना रूतबा है पर उन्होंने फैज़ के काफिये को पकड़ पूरी गज़ल लिख दी और उस महान फैज़ ने भी ग़ालिब की ग़ज़लों में अपने मजमून ढूंढे. हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहिब ने थोमस मूर की कविता "द लाईट ऑफ अदर डेज़" का अनुवाद किया और वह अनुवाद "अक्सर शबे तन्हाई में" मूर की कविता से अलग और कई मायनों में बेहतर हो गया. अक्सर शबे तन्हाई में मिर्ज़ा की सृजनशीलता कस कस कर भरी है, आज पढ़ने वाले मूर की कविता को प्रेरणा भर मानते हैं. गुलज़ार फिल्मों में लिखने के कारण मारे गए. दर असल हमारी फिल्मवालों ने प्रेरणा के नाम पर इतनी चोरियां की हैं कि हमें यकीन नहीं होता कि काजल की कोठरी में किसी का कुर्ता सफ़ेद बचेगा. यकीन का मरना अच्छी बात नहीं है.

Monday, January 25, 2010

Rock is On! Hail Arjun.

January 25, 2010 will go down in history as the day India finally grew up. Arjun Rampal has won a much-deserved National Award for Rock On. Best supporting role. Arjun Rampal is the Rock that supported the On in Rock On. Arjun Rampal has reinvented the art of acting with as many expressions as a rock can have. Arjun Rampal is a living example of deadpan acting. Pan because you don't zoom on his face, nothing happens there. Just some perspiration. yet, he is an inspiration to us all. Thank you Arjun for showing to us that no handicap can come in the way of sheer lack of talent. Shah Rukh Khan counts him as his chaddi-buddy. Yes Shah Rukh likes his buddies, hold your pants.

You are jealous. Especially those of you who are actors. But now acting is not actor's only territory. In a democracy like ours, everyone has the right to act and win a national award. You hate Arjun because he did it. You laugh at him because you know he cannot laugh or cry on screen. He is a method actor, only you don't know the method. His family is family friends with the Khans who are family friends of first family of the country. The first family controls the government that runs the nation. It's family first in the first family. Well, well, you can now link it all and make baseless allegations and indulge in gossip.

Wednesday, December 30, 2009

नौ के नश्तर बहुत हुए, दस में बस हो



आज २००९ हमसे विदा लेगा. इस के साथ ही २१वीं सदी का पहला दशक इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा. जाते दशक को दुनिया कोई भाव-भीनी विदाई नहीं देगी, क्योंकि इसकी मीठी यादों के साथ एक चुभन होगी, उन ज़ख्मों की जो इसके जाने के बाद भी रिसेंगे. और फिर दुनिया ये दुआ करेगी कि ऐसा दस साल फिर देखने को नहीं मिले तो अच्छा.
 
२१वीं सदी का स्वागत कितनी अपेक्षाओं और उम्मीदों के साथ हुआ था पर २००१ के नवम्बर में न्यूयोंर्क के ट्विन टॉवर के साथ वे सपने चकनाचूर हो गए. अमेरिका को नया दुश्मन मिला जो कोई देश नहीं था, और नहीं कोई सेना. ये नॉन-स्टेट एक्टर्स थे. ओसामा बिन लादेन का अल-काइदा एक बिना चेहरे वाला दुश्मन था. उस से निपटने के लिए जिस तरह की नीतियां अपनाई गई, उस से अल-काइदा कमज़ोर नहीं हुआ. ओसामा भले अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पहाडियों में सिमट गया पर उस की सोच का विस्तार होता गया. बुश की नीतियों ने अमेरिका का भला किया ना ही दुनिया का.
 
भारत में संसद से लेकर सड़क किनारे डस्टबिन तक, वह सोच बारूद बनकर फूटती रही और जाने कितने निर्दोष हिन्दुस्तानी मरे जो सिलसिला मुंबई में पिछले बरस हुए हमलों तक चलता रहा. एक दशक लहू से भींग गया. दिल्ली, अहमदाबाद, जयपुर, बंगलौर, हैदराबाद, मुंबई... शहर के शहर ज़ख़्मी हुए. पाकिस्तान में बैठे आतंक के आकाओं ने अल-काइदा से हाथ मिला लिया. भारत के एक गैंगस्टर की भी मदद लेते रहे, भारत को तबाह करने में. कश्मीर को चैन से जीने ना दिया. जब जब आग बुझी, नई चिंगारियां भड़काई गईं.
 
पाकिस्तान ने भी वही सब कुछ भोग जिसका निर्यात वह भारत को कर रहा था. उसके अपने नागरिक उन्हीं शक्तियों का शिकार होते रहे, अपने ही घर में, अपने बाज़ारों और इबादतगाहों में. २००९ के साथ क्या ये सिलसिला थम जाएगा. नहीं पर, खून के बदले खून की नीतियों ने खूंरेजी को ज़िंदा रखा है. इस्लामिक देशों को अपने देश में आर्थिक विषमताओं, अशिक्षा, बेरोज़गारी जैसी समस्याओं को निपटाना होगा ताकि आतंकी संगठनों को रंगरूट नहीं मिलें वहीं पश्चिम के देशों को अपनी घरेलु और विदेश नीतियों में सौहार्द का अंश बढ़ाना होगा जिस से असंतोष कम हो.
 
पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों के युवाओं में इस दुनिया की उम्मीदें भरनी होगी ताकि वह मृत्युलोक के छल में अपनी जान देने को तैयार नहीं हों. फिर कोई अजमल कसाब अपने घर की नाइंसाफी से तंग होकर पड़ोसी के घर जान लेने और जान देने आये. इस दशक के अवसान पर यही दुआ है कि अब खून का ये खेल खत्म हो. दस के दरवाज़े पर दस्तक दे रही दुनिया आज प्रार्थना करेगी कि उसकी झोली में मरहम होंगे, नश्तर नहीं. आमीन.

Wednesday, December 23, 2009

झारखंडित जनादेश


 अगर लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जनता की आकांक्षाओं का दर्पण होता है, तो झारखण्ड के जनादेश में जनता अपना चेहरा देख नहीं पाएगी. टूटे आईने में अक्स भी बिखर जाता है, कुछ ऐसा ही हुआ है झारखण्ड में. संभावनाओं और संपदाओं से सम्पूर्ण तथा सुविधाओं और विकास से वंचित इस राज्य का दुर्भाग्य ही कहिये कि जब से इसका गठन हुआ है, इसे स्थिरता नसीब नहीं हुई. जब बीजेपी को बहुमत था तो उस पार्टी की आतंरिक अस्थिरता का बोझ तब नवजात राज्य के सीने को रौंदता रहा फिर शिबू सोरेन और लालू यादव की रचित पटकथा पर कोड़ा नायक बन बैठे. उनकी खलनायकी के राज़ जब खुलने लगे तो झारखण्ड सहम सा गया. ऎसी आशा भी की जाने लगी कि लूट-खसोट और बन्दर-बाँट की राजनीति में पिट चुकी जनता इस बार अपने लिए न्याय ढूंढेगी. कोड़ा की पत्नी भारी बहुमत से जीती. और सभी हार गए, जनता भी.
 
जो तस्वीर उभर कर सामने आई है उस से लगता है जोड़ तोड़ होगा और शासन जो भी करे बन्दर-बाँट का डर बना रहेगा. आत्म-विश्वास से लबालब कांग्रेस ने पूर्व भाजपाई और अच्छी छवि वाले बाबूलाल मरांडी की नवगठित पार्टी को ज़्यादा सीट नहीं दी पर परिणामों ने कांग्रेस को चौंका दिया. अब जो हुआ सो हुआ पर इस गठबंधन को शिबू सोरेन की झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के समर्थन की दरकार होगी. लालू की राष्ट्रीय जनता दल शायद ही पांच के अंक से आगे जाए पर ऐसे खंडित जनादेश में वह भी एक रोल निभाएंगे. झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सोरेन चाहते हैं किंग बनना पर जनता ने उन्हें किंगमेकर तो बना ही दिया. उनके बिना कोई सरकार नहीं बनेगी और उनकी जिद है कि मुख्यमंत्री वही बनेंगे. जिस खिचडी से झारखण्ड का आर्थिक स्वास्थ्य खराब हुआ वही खिचड़ी फिर पकेगी. शिबू सोरेन के दामन पर भ्रष्टाचार के गहरे धब्बे हैं और उन्हें जो पार्टी भी समर्थन दे उसे यह प्रतिज्ञा लेनी होगी कि झारखण्ड की गरीब जनता के साथ फिर धोखा ना हो. ऐसे मौकों पर कई चिन्तक द्वि-दलीय व्यवस्था की वकालत करते हैं पर क्या उस के अलावा कोई समाधान है? जनता को अपने वोट के बारे में विचार करना होगा और पार्टियों को भी चुनाव के पहले अपने साथियों को चुनना होगा, चुनाव के बाद खरीद-फरोख्त के आरोप लगते हैं और लोकतंत्र की छवि खराब होती है. झारखण्ड में लोकतंत्र की छवि का साफ़ और न्यायपूर्ण होना कहीं ज़्यादा आवश्यक है क्योंकि माओवादी संगठन ऎसी कमजोरियों को भुना कर जनता का समर्थन प्राप्त करते हैं. आज इस राज्य का एक बड़ा भाग माओवादी प्रभाव में है. उस मर्ज़ की दवा लोकतंत्र का सफल और विश्वसनीय रूप है. क्या झारखण्ड के नेता स्वच्छ और विश्वसनीय लोकतंत्र के पहरुए बनने के लिए तैयार हैं?

Tuesday, December 22, 2009

Freeloading is approved!

सादगी की कसमें खाने और शशि थरूर के केटल क्लास में सफ़र करने का शिगूफा भूल जाइए. देश हित के बिलों को सालों लटका कर रखने वाले सांसद और मंत्री अपनी ऐश के सामान पर बहस तक नहीं करते. मंगलवार को राज्य सभा में एक बिल बिना बहस पास हो गया जो अब मंत्रियों को यह अधिकार देता है कि वह जितने  सगे- संबंधी, यार-दोस्त  चाहें अपने साथ हवाई यात्रा पर ले जा सकते हैं.  मंत्रियों के वेतन और भत्तों का बिल सुधार इस के पहले लोक सभा में १८ दिसम्बर को पास हो गया था. जी हाँ, वहां भी बिना बहस के. इस पर संसद के किसी सदस्य को आपत्ति नहीं क्योंकि, उन्हें यह सुविधा पहले से मिलती है. ख़ास बात है कि अब मंत्री जी साथ हों या ना हों, उनके सगे संबंधी मंत्री जी मुफ्त हवाई यात्रा कर पायेंगे. सगे सम्बन्धियों की संख्या की कोई सीमा नहीं है और वह अकेले भी ऎसी मुफ्त यात्रा का आनंद उठा सकते हैं. मंत्री जी के के मित्र, चमचे जो चाहें इस का फायदा उठा सकते हैं अगर वह मंत्री जी के साथ लग लें.  

Wednesday, December 16, 2009

Goaah, Ouch!

From being a hippie destination in the Seventies, Goa has come a long way to become the prime holiday destination for Indians and foreigners alike. December and January are the months when the tourism season at its peak. But this December, a cloud of doubt hangs over the tourism industry in Goa. Not because domestic or foreign travelers are keeping away, but because the rising crime against tourists has triggered a debate which is unintelligible and Goa politicians are making claims which the civil society finds outrageous. Goa's tourism minister wrote to his boss, the chief minister, that if law and order is not strengthened Goa may well become the rape capital of India. Chief Minister Digamabar Kamat's reply was shocking to say the least. He said tourists are equally to blame for crime against tourists, especially women.  They should be careful as to not mix with the local populace and dress appropriately. Congress MP from the state scandalized the Rajya Sabha by hinting that recent victims of rape had invited it upon themselves. Some members of the august house were furious at this insinuation and termed it a misogynist idea to blame rape victims for rape. The National Commission for Women criticized him and the Russian consulate said they do issue travel advisories to its nationals but Naik had crossed the line. A Russian woman was recently raped in Goa and the police initially refused to register a case, saying the woman should not have gone with a man in the dark of the night. A similar argument was made when British teenager Scarlett Keeling was raped and murdered. Giving out advice to tourists is not wrong but before blaming the victims, the lawmakers and the law-keepers must take a good look at the law of the land. A husband can be charged with rape if the woman has not given consent. Violation of anyone under 16 is considered rape in the eye of the law. It does not matter whether the victim was walking with the offender or friends with him. A rape is a rape.

What Kamat said is not entirely rubbish. The government must warn tourists against dangers and possible threats in Goa. It should also advise tourists about appropriate dresses for places. That's part of the government's job. But the government must make residents and visitors confident about their security. That's the government's job too. Kamat and Naik should know that crime is committed only when the criminal thinks he can get away with it. It is not decided by the clothes on the victim but the lack of fear of law in the offender's mind. Goa politicians need to stop talking and start working. The state's prime industry is at stake, its image is being shredded in public. They should assure tourists of their safety and not scare them. And for that, they need to secure justice for the victims. A promise to act is any day better than an excuse to not act.

Wednesday, December 02, 2009

ओबामा के सपने

राष्ट्रपति बराक ओबामा के नए अफगान-पाकिस्तान रणनीति की घोषणा में नया कुछ नहीं है. यह अमेरिका की दोमुंही नीतियों का एक और दस्तावेज है, जिसमें युद्ध के अमेरिकी समर्थकों को ३०,००० और सैनिक भेजकर खुश किया गया, वहीं युद्ध के विरोधियों को अफगानिस्तान से वापसी की एक तारीख थामकर शांत किया गया. कल के एक सर्वे में पता चला युद्ध के समर्थक घट कर ३५ फीसदी रह गए हैं. और 55 फ़ीसदी अब इस खूनी खेल का अंत चाहते हैं जिसने 800 अमेरिकियों की जान और 200 बिलियन डॉलर लील चुका है. विर्दोहियों में ज़्यादातर ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं. यह अमेरिका के लोगों के लिए दोमुंहा सन्देश था. कुछ ऐसा ही सन्देश पाकिस्तान को दिया गया है. स्पष्ट है अब ओबामा ने अपनी सेना को युद्धक्षेत्र पाकिस्तान के भीतर तक ले जाने को हरी झंडी डे दी है. वहीं पाकिस्तान को और मदद और हथियार की पेशकश भी कर दी गई. जिस आमूल परिवर्तन की बात ओबामा ने अपने प्रशासन के शुरुआती दिनों में की, वह इस रणनीति में नहीं दिखती. जोर्ज बुश राष्ट्रपति नहीं रहे पर ओबामा कितने अलग हैं, यह un ३०,००० सैनिकों की तैनाती के बाद पता चल जाएगा. अमेरिका का सबसे लंबा युद्ध अगले 18 महीने में ख़त्म कैसे होगा जब 8 साल में तालिबान मजबूत होता दिख रहा है? यह सवाल जायज़ है पर इसके जवाब के लिए इंतज़ार ज़रूरी है. पर उस सवाल का क्या करें जो इस पुरी रणनीति पर सवाल खड़ा करता है. आप सैनिकों की वापसी का तारीख देकर कोई युद्ध कैसे जीत सकते हैं? सनद रहे, यहाँ अमेरिका किसी देश की सेना से आमने सामने नहीं है. तालिबान गुरिल्ला युद्ध कर रहे हैं? जब तालिबान को यह पता हो कि अमेरिका जुलाई २०११ में सब कुछ छोड़ वापस जाएगा, तो वह अगले १८ महीने अपने गुफाओं में काट लेंगे. अमेरिकियों के जाने के बाद फिर काबुल हथिया लेंगे. तो क्या घरेलु युद्ध विरोधियों को खुश करने में ओबामा ने एक बड़ी भूल कर दी है? इन सब जवाबों के पहले अमेरिका को यह समझ लेना चाहिए कि वह किसी शत्रु देश को कराने नहीं निकले हैं. वास्तविकता यह है कि अफगानिस्तान ही एक देश नहीं. यह वह ज़मीन है, जो कबीलाई समाजों से बना है और यह ज़मीन कई आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा होने के कारण देश कहलाने लगा है. वहां लोकतंत्र की सफलता का हाल हालिया चुनावों में ज़ाहिर हो गया. उस देश के सामजिक और शासनात्मक स्थिति यह नहीं है कि वहां लोकतंत्र सफल हो. उनका लोकतंत्र लोया जिरगा तक सीमित है. सोवियत रूस ने उन्हें जबरन एक कर रखा था, पर उन्हें भी भागना पड़ा. उनके लिए आसान था क्योंकि वह आमू नदी पर कर अपने देश चले गए. अमेरिका के लिए अफगानिस्तान छोड़ना उतना आसान नहीं होगा. ओबामा के जुलाई २०११ के सपने सच होते नहीं दीखते.

Thursday, November 26, 2009

Stop that likelihood

What happened in parliament today, Lok Sabha to be specific, was unseemly and unfortunate. An ugly spat on what Speaker Meira Kumar rightly called a "solemn" day. But Pranab Mukherjee's statement that if Advani kept politicking, another worse attack would take place. Dada Mukherjee must have said something as a retort but this has been a refrain right from the prime minister to the lowly constable.
Prime Minister Manmohan Singh has said, in so many words and many many times, that another attack is likely. The top defence officers keep claiming we are ready but one can't rule out another attack. Can we stop this likely business? What the hell do we have a government for? Do we have an intelligence system or not? Can our leaders tell us that they will not let another 26/11 happen? At least on 26/11.

Friday, November 13, 2009

नेता नियुक्त नहीं किये जाते, नेता हो जाते हैं

अज सरे बालीने मन बर खेज़ ऐ नादाँ तबीब,
दर्द मंदे इश्क रा दारू बजुज़ दीदार नीस्त.
 
(चल हट जा मेरे सिरहाने से ऐ डॉक्टर,
मैं इश्क बीमार हूँ, सिवा दीदार कोई दवा नहीं) 
 
अमीर खुसरो रहमतुल्लाह अलय ने यह पंक्तियाँ अपने पीर की जुदाई में कही थी. पर आप इन्हें आज की बीजेपी पर बेबाक टिपण्णी कह सकते हैं. नेतृत्व-विहीन, दिशा-हीन और जघन्य कमजोरी से ग्रसित पार्टी को संजीवनी चाहिए. एक सुदृढ़, संकल्पित नेता के दीदार के सिवा कोई इलाज नहीं.  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत ने कहा कि दवा दारु चाहिए या कीमोथेरापी, अपनी इलाज के लिए बीमार स्वयं जिम्मेदार है. फिर अपने स्वयंसेवक नाम को सार्थक करते हुए संघ ने स्वयं देसी नुस्खे बनाना शुरू कर दिया. शुरुआत इस से हुई कि दिल्ली  का कोई नेता अब पार्टी की बागडोर नहीं थामेगा. अभी अटकलें चल रही हैं और सबसे आगे नितिन गडकरी हैं. जी हाँ, कैंसर के इलाज के लिए गुलकंद की सलाह डॉक्टर भगवत ने दी है. बीमार को अल्लाह रखे.
बीजेपी को जब भी बीमारियों ने सताया, उसने रामबाण का प्रयोग किया. आज बीजेपी का हर छुटभैया नेता एल.के आडवाणी को कोसते नहीं थकता, जो बीजेपी को पोसते पोसते बूढे हो गए. भावी प्रधानमंत्री का पद संभालते उम्र गुज़र गई, और पार्टी में कोई पद नहीं रहा. टायर नहीं हुए पर रिटायर होने पर मजबूर हैं. क्योंकि युवा शक्ति का ज़माना है. कांग्रेस के प्रधानमंत्री छरहरे जितने हों, उम्र में सिर्फ पांच साल बड़े आडवानी से बस उन्नीस हैं. युवा होना एक मनः स्थिति है, और इस लिहाज़ से बीजेपी के मुकाबले उस से ९५ साल बड़ी कांग्रेस जवान दिखती है. बीजेपी अपने लिए एक अदद राहुल गांधी को ढूँढने निकलती है तो उसे नितिन गडकरी मिलते हैं. दीवारों पर पोस्टर चिपकाने से लेकर महाराष्ट्र राज्य बीजेपी में हर पद संभालने वाले गडकरी आज कल दिल्ली में अपनी कुर्सी तलाश रहे हैं. संघ की टिकट से लैस लुटयन की दिल्ली में पार्टी के मठाधीशों से स्वीकृति की दरकार लिए. पार्टी के वर्तमान नेता झंडेवालान में संघ के दफ्तर में हाजिरी बजा रहे हैं. कीमोथेरपी करें या ऑपरेशन, इस पर विचार चल रहा है. गडकरी नामक गुलकंद से बीमार बीजेपी में नई जान आयेगी, इस का भरोसा किसी को नहीं. शिव सेना के पिछलग्गू होकर महाराष्ट्र के हालिया चुनाव में मुंह की खाए नेता अगर देशव्यापी नेतृत्व दे तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, मठाधीशों की ये दलील नाजायज़ नहीं लगती.
खासकर तब जब राजनाथ के राज में सारी चमक मिटटी में मिल गई हो. सवाल है कि एक दल जिसने पांच साल देश की सरकार का नेतृत्व किया है उसे कौन सा लकवा मार गया कि नितिन गडकरी से बेहतर नेता नहीं मिल पा रहा. गडकरी में करिश्मा नहीं और उन्हें जनता तो क्या पार्टी के कार्यकर्ता नहीं जानते. नरेंद्र मोदी विकल्प हैं पर उनकी छवि उन्हें गुजरात के बाहर जाने से रोकेगी, यह वह भी जानते हैं. गुजरात के पांच करोड़ जनता की सेवा का संकल्प उन्होंने यूं ही नहीं लिया है. विपक्ष का नेता कैबिनेट मंत्री के दर्जे का होता है और मोदी को तो कई देशों में वीसा नहीं मिलता. आने वाले राष्ट्रप्रमुख राजनाथ से हाथ मिलाते हैं, पर उनके संग कितने लोग फोटो खिंचाएंगे इस पर संदेह है. अरुण जेटली वाक्शक्ति के पहलवान हैं पर मंच पर आने की क्षमता नहीं इसलिए नेपथ्य में ही गूँजते रहेंगे. जसवंत सिंह को जिन्ना के जिन ने निगल लिया और सुषमा स्वराज की तुलना सोनिया से होगी तो पलड़ा हल्का होगा. 
पर  खेवैया चाहिए नहीं तो डूबती नैय्या कौन बचायेगा. नेतृत्व के दिवालियेपन का नतीजा यह है कि जहाँ उभर रहे थे वहां भी डगमग हो रहे हैं. अगर मजबूत नेता होता तो रेड्डी बंधू लोकप्रिय येद्दियुरप्पा को सरेआम रुला नहीं पाते. कर्णाटक का हालिया नाटक इस बीमारी का लक्षण मात्र है. पर नेतृत्व से भी ज़्यादा ज़रूरी है अपने पैरों पर खड़ा होना. संघ के पालने में बैठकर सत्ता के दुधमुंहे सपने पालने से जीवनी शक्ति नहीं आयेगी. वाजपेयी संघ के रहते भी अपनी राजनीति स्वयं करते थे और यहाँ तक कि अल्पसंख्यकों तक में अपनी छवि के बल पर पैठ बनाने की क्षमता रखते थे. बीजेपी को एक नया वाजपेयी चाहिए जो बोले तो लोग सुनें, चुनें या ना चुनें उनकी मर्जी. पहले वह करिश्मा चाहिए, एक प्राकृतिक नेतृत्व का आत्मबल चाहिए.  संघ स्वयं अपनी ज़मीन खो रहा है, क्योंकि उसकी विचारधारा प्राचीन हो गई है. नया भारत अब वापस सोने की चिडिया नहीं होना चाहता, नया भारत सिलीकोन  का चिप बनकर ज़्यादा खुश है. अगर नए भारत के साथ कदम दर कदम चलना है तो बीजेपी को मर कर ज़िंदा होना पडेगा. इस बीमारी का इलाज ढूँढने के चक्कर में वक़्त जाया किये बिना. नई पार्टी, नया संविधान फिर नेता स्वयं अवतरित होगा. नेता नियुक्त नहीं किये जाते, नेता हो जाते हैं.
अमीर खुसरो की उन पंक्तियों को कव्वाल अज़ीज़ मियाँ संशोधित कर गाते थे. पहली फ़ारसी की लाइन के बाद अपनी हिन्दुस्तानी की लाइन  लगा कर. वक़्त आ गया है बीजेपी संघ से अज़ीज़ मियां वाला वर्ज़न कहे.
अज सरे बालीने मन बर खेज़ ऐ नादाँ तबीब,
तू अच्छा कर नहीं सकता, मैं अच्छा हो नहीं सकता!

Thursday, November 12, 2009

Dawood is more powerful than Sarkozy

Dawood Ibrahim is the world's 50th most powerful person, according to a new list of powerful people published by the prestigious Forbes magazine. The mafia lord, drug dealer and now a declared terrorist is above many heads of states like Sarkozy and  rich multinational industrialists like Ratan Tata and Lakshmi Mittal. The list has 67 people in total and people selected turn out to be one in a 100 million people in the world.

American President Barack Obama tops the list, followed by Chinese bossman Hu Jintao and Russian premier Vladimir Putin. World's most wanted terrorist Osama bin Laden comes at no. 37, just below Indian Prime Minister Manmohan Singh who is at 36. Pakistani Prime Minister Yusuf Raza Gilani is at after Osama at 38.

How did terrorists prop up in a list full of CEOs, presidents, prime ministers and even the Dalai Lama? Forbes says they considered four parameters.

"First, do they have influence over lots of other people? Do they control relatively large financial resources compared with their peers? Are they powerful in multiple spheres? There are only 67 slots on our list--one for every 100 million people on the planet--so being powerful in just one area is not enough. Lastly, we insisted that our choices actively use their power."

 

Considering that Osama is believed to be living in Pakistan's northwest and Dawood in Karachi, Osama is the most powerful person living in Pakistan, more powerful than the Pakistani Prime Minister. The main accused in Mumbai serial bomb blasts case Dawood Ibrahim Kaskar is the third most powerful person living in Pakistan. And by the way Osama and Dawood are not valid Pakistani citizens, they are only sheltered and protected by the ISI. 

 

In other prominent points, Congress chief Sonia Gandhi does not figure in the list because she does not actively uses her power. Hillary Clinton is way above her husband, former President Bill Clinton.

Friday, October 23, 2009

हुआ हिन में लाल कमीज़

Diary item ...

 


लाल कमीज़
पन्द्रहवें आसियान शिखर सम्मलेन पर लाल कमीज़ का गहरा साया है. थाईलैंड के युनाइटेड फ्रंट फॉर डेमोक्रेसी अगेंस्ट डिक्टेटरशिप को अनाधिकारिक तौर पर रेड शर्ट कहते हैं क्योंकि अपने उग्र प्रदर्शनों के दौरान इसके सदस्य लाल कमीज़ पहनते हैं. ये दल पूर्व प्रधानमंत्री थाकसिन सिनावातरा के बाइज्ज़त थाईलैंड लौटने देने के लिए आन्दोलन कर रहा है. सितम्बर २००६ में सेना ने तख्तापलट कर थाकसिन की सरकार को हटा दिया था और उनपर भ्रष्टाचार के मुक़दमे चलाये गए. थाकसिन को दो साल की कैद की सज़ा सुनाई गई है पर वह देश से बाहर हैं. थाईलैंड के ग्रामीण और पिछडे इलाकों में थाकसिन बहुत लोकप्रिय हैं. उनके समर्थक पार्टियों ने २००७ की आम सभा में बहुमत प्राप्त कर लिया था पर उनमें से मुख्य पार्टी पीपुल्स पॉवर पार्टी को एक संवैधानिक कानून ला कर अवैध घोषित कर दिया गया. तब से उन के समर्थक लाल कमीज़ दाल अक्सर थाईलैंड के शहरों में प्रदर्शन करते हैं.


इस के पहले ये सम्मलेन थाईलैंड के पट्ट्या में होने वाला था पर लाल कमीज़ के धमकियों से उसे निरस्त करना पडा था. अब जब यह हुआ हिन् में हो रहा है, तो इस में लाल कमीज़ वालों ने वादा किया है कि वे सम्मेलन को शांतिपूर्वक चलने देंगे बशर्ते उन्हें अपनी मांगें शीर्ष नेताओं के सामने रखने दिया जाए. थाईलैंड की सेना ने उनकी बात मान ली क्योंकि हुआ हिन् में हंगामे का मतलब होता सम्मेलन का पुनः निरस्त होना.

 

फिर भी हुआ हिन की सुरक्षा व्यवस्था पुलिस के हाथों में नहीं. बैंकॉक के २०० किमी दक्षिण में स्थित चा आम और हुआ हिन बैंकॉक या पट्टाया की तरह पर्यटन स्थल तो हैं पर तुलनात्मक रूप में उनसे काफी शांत और स्वच्छ. पर आसियान बैठक को देखते हुए सेना ने सुरक्षा व्यवस्था अपने हाथों में ले ली है. आम दिनों की तरह पर्यटकों की चहल पहल कम है. १८,००० सैनिक और नौसेना के कई युद्धपोत चा आम और हुआ हिन में हर आने जाने वालों पर नज़र रख रही है.

 

भारत चाहता है कि वह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के इस संगठन के साथ बेहतर तालमेल कर इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम कर सकता है पर इसे लगता है सिर्फ भारत और चीन ही इतनी गंभीरता से लेते हैं. सदस्य देशों में कई के शीर्ष नेता सम्मेलन के उदघाटन समारोह से नदारद रहे. इंडोनेशिया, फिलिपिन्स और मलयेशिया के प्रमुखों में किसी ने ख़राब मौसम का हवाला दिया तो किसी ने घरेलू ज़रूरतों का बहाना बनाया. जो आये उनमें दुराव कम होता नहीं दिखता. थाईलैंड और फिलीपींस में चावल के दामों के ऊपर का विवाद नहीं थमा है और दूसरे पडोसी कम्बोडिया से सीमा विवाद जस का तस है. थाईलैंड के प्रधानमंत्री अभिसित विज्जजिवा को चिढाने के लिए कम्बोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने कहा कि पूर्व थाई प्रधानमंत्री थाकसिन सिनावातरा उनके निकट मित्र हैं और वह जब चाहें कम्बोडिया में उनके घर रह सकते हैं. इस पर थी प्रधानमंत्री अभिसित ने कहा कि उन्हें दूसरे दिन ही अपने मित्र को थाईलैंड के कानून के हवाले करना पड़ेगा क्योंकि कम्बोडिया और थाईलैंड के बीच संधि है कि वे एक दूसरे देश के अपराधियों को शरण नहीं देंगे. खैर इस चीख चीख में लाल कमीज़ वालों के बीच हुन सेन हीरो हो गए हैं.